लगातार बढ़ते संगीन अपराधों के पीछे कहीं न कहीं सरकारी साठगांठ का खेल भी सामने आ रहा है। बिना कारतूस के कोई भी असलाह किसी काम का नहीं होता, लेकिन यहां तो नियमों को धता बताकर महज 10 रुपये के लालच में अवैध असलहों को चार गुना तक वैध कारतूस बेचे जा रहे हैं।
आपराधिक गैंगों से जुड़े शूटर अवैध पिस्टल और रिवाल्वरों में ऐसे कारतूसों का धड़ल्ले से प्रयोग कर रहे हैं। प्रशासन के शस्त्र अनुभाग द्वारा शस्त्र विक्रेताओं के रिकॉर्ड की जांच में खानापूर्ति ही होती है। सस्ता लालच जरायम की जड़ बन रहा है। आला अफसर भी इस फर्जीवाड़े से इंकार नहीं करते हैं, लेकिन उसके बावजूद सब कुछ रूटीन में चल रहा है।
ये है कारतूसों की बिक्री का नियम
शस्त्र लाइसेंस बनने के बाद उन पर कारतूस खरीद का प्रतिबंध दर्ज होता है। जिसके तहत बंदूक और राइफल के लिए एक वर्ष में अधिकतम 100 कारतूस और एक बार में सिर्फ दस कारतूस खरीदने का प्रतिबंध है। जबकि रिवाल्वर और पिस्टल के लिए एक वर्ष में मात्र 25 और एक बार में दस कारतूस खरीदने का नियम है।
यह प्रतिबंध लाइसेंस पर दर्ज होता है। इन कारतूसों की बिक्री का लाइसेंस शस्त्र विक्रेताओं के पास होता है। जिन्हें कारतूस बिक्री के बाद अपनी दुकान की मुहर लगाकर शस्त्र लाइसेंस पर दर्ज करना होता है। इसके साथ ही शस्त्र विक्रेताओं को कारतूस डीलर के यहां से खरीदने और उसे बेचने का पूरा ब्यौरा रजिस्टर में दर्ज करना होता है।
ऐसे चल रहा लालच का खेल
कारतूस या शस्त्र खरीद के लिए कोई क्षेत्र प्रतिबंधित नहीं है। शस्त्र लाइसेंस धारक अपनी सुविधानुसार किसी भी जनपद में जाकर वहां के शस्त्र विक्रेता से शस्त्र या कारतूस खरीद सकता है। ऐसे में कारतूस बिक्री का खेल बढ़ रहा है। शस्त्र विक्रेता कारतूस बिक्री का ब्यौरा अपने रजिस्टर में तो दर्ज कर लेते हैं, लेकिन उसे शस्त्र लाइसेंस पर दर्ज नहीं करते हैं। इसके लिए प्रति कारतूस दस रुपये का अतिरिक्त भुगतान लिया जाता है। जब कारतूस खरीद का ब्यौरा लाइसेंस पर दर्ज ही नहीं होगा, तो लाइसेंस धारक एक दिन में एक से ज्यादा दुकानों पर जाकर आराम से कारतूस खरीद सकता है। ऐसे में एक रिवाल्वर के लाइसेंस धारक को साल में 25 नहीं बल्कि इससे चार गुना तक कारतूस बेच दिए जाते हैं।
खोखा जमा करने में भी खेल
शासन ने आदेश दिया था कि कारतूस बिक्री के दौरान खोखा वापसी भी की जाए। दस कारतूस खरीदने वाले को कम से कम आठ खोखा जमा करना अनिवार्य होगा। लेकिन यहां भी दस रुपये अतिरिक्त लेकर बगैर खोखा कारतूस दे दिये जाते हैं। सूत्रों की मानें तो यह दस रुपये शस्त्र अनुभाग का हिस्सा होता है। क्योंकि जांच में शस्त्र अनुभाग को कम खोखे मिलते हैं, जिन्हें दस रुपये प्रति कारतूस के हिसाब से रिश्वत देकर क्लीन चिट दे दी जाती है।
वैध कारतूसों का प्रयोग पूरी तरह अवैध
ऐसे वैध कारतूसों का प्रयोग पूरी तरह अवैध रूप से हो रहा है। ऐसे कारतूसों को अधिकांश रूप से गलत हाथों में बेच दिया जाता है। वहीं, शादी या अन्य मंगल समारोहों में भी ऐसे ही कारतूसों से हर्ष फायरिंग होती हैं। जिनसे किसी न किसी निर्दोष की जान जाती है। वैसे भी कोई ऐसा उल्लेखनीय उदाहरण सामने नहीं आता कि किसी लाइसेंसधारी ने साल भर में अपने कारतूसों का कभी पूरा या सही प्रयोग किया हो। या उस असलहे से अपनी जान बचायी हो।
खोखा मामले में हाईकोर्ट गए शस्त्र विक्रेता
खोखा जमा कराकर कारतूस बेचने के आदेश पर शस्त्र विक्रेता हाईकोर्ट जा पहुंचे हैं। इस मामले में शस्त्र विक्रेता जहां अपने पक्ष में फैसला होने की बात कर रहे हैं, तो शस्त्र अनुभाग ऐसे किसी आदेश के न आने की बात कर रहा है। लेकि न इस याचिका की आड़ में खोखा जमा कराने का मामला अधर में लटका हुआ है।
नियमों की ढील भी आ रही आड़े
इस खेल में हालांकि शस्त्र विक्रेता और शस्त्र अनुभाग के कर्मचारी दोनों ही शामिल हैं। लेकिन सबसे बड़ी अड़चन नियमों के कारण भी है। कारतूस बिक्री का ब्यौरा अभी भी मैनुअल रखा जाता है। कारतूसों की बिक्री रजिस्टर में अंकित होती है। जिसके ब्यौरे की वहां के जिला शस्त्र प्रभारी जांच करते हैं। ऐसे में एक ही लाइसेंस पर खरीदे गये कारतूसों बिक्री का ब्यौरे का मिलान असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर है।
क्या होना चाहिए नियम
शस्त्र लाइसेंस पर अब यूनिक आईडी नंबर जारी किये गये हैं। इन्हीं यूनिक आईडी नंबर के जरिये कारतूसों की बिक्री का ब्यौरा ऑनलाइन होना चाहिए। ऐसे में जिस भी लाइसेंस पर निर्धारित सीमा से अधिक कारतूस क्रय किये जाएंगे, उसका डाटा अपने आप सामने आ जाएगा। क्योंकि यह ऑनलाइन प्रक्रिया सेंट्रलाइज होगी। ऐसे में यदि कोई दूसरे जनपद ही नहीं प्रदेश से भी कारतूस खरीदता है तो उसका ब्यौरा उसके लाइसेंस पर आ जाएगा।