वेस्ट यूपी के किसानों को अब अंगूर की खेती के लिए जागरूक किया जा रहा है। नयी प्रजाति की खेती के लिए सबसे ज्यादा छोटे किसानों को जोड़ा जा रहा है, जो कम खेती और कम लागत के साथ आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकें। कृषि विश्वविद्यालय में चल रहे शोध में भी अच्छे परिणाम सामने आ रहे है।
सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के उद्यान विभाग द्वारा अंगूर की खेती को बढ़ावा देने के लिए पनीर द्राक्षी पर रिसर्च किया जा रहा है। वेस्ट यूपी में अंगूर की खेती की अपार संभावनाएं है। यहां के किसानों के अंगूर की खेती घाटे का सौदा नहीं है। किसान गन्ना, आलू और धान के अलावा अंगूर की खेती कर लाभ ले सकते हैं। ऐसे किसानों को समय-समय पर जागरूक करने की जरूरत है।
वेस्ट का तापमान अनुकूल
कृषि विवि के वैज्ञानिकों का कहना है कि वेस्ट यूपी में इस खेती के लिए तापक्रम भी अनुकूल है। मौसम का भी इस पर कोई खास असर नहीं दिखेगा। वेस्ट यूपी के साथ-साथ उत्तर भारत में अंगूर की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। खास बात यह है कि वेस्ट यूपी में छोटे किसानों को इससे जोड़ा जा रहा है। इसके लिए विश्वविद्यालय में समय-समय पर किसानों को अंगूर की खेती का समय और उससे होने वाले लाभ और उत्पादन के बारे में जानकारी दी जा रही है। किसान भी इसको लेकर उत्साहित हैं और अन्य फसलों को भी बढ़ावा देना चाहता है। इसके लिए उसे सही मार्गदर्शन मिल जाए तो वह आगे बढ़ सकता है।
ये हैं खासियत
- यह प्रजाति अन्य प्रजातियों से एक माह पहले तैयार होती है
- प्रजाति स्वादिष्ट होती है। बीज छोटा होता है। फल मीठा होता है
- इसका पौधा काफी बढ़ता है, जिस पर फल अच्छे आते हैं
- प्रथम बार ही इसमें सौ से 150 फल तैयार होते हैं
- इसमें एंटीऑक्सीडेंट भी अधिक रहता है, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है
- इस प्रजाति में बीमारी कम लगती है और सुंदरता भी अच्छी होती है
केरल से वेस्ट का सफर
कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर योगेश राजभर का कहना है कि यह प्रजाति केरल के बार्डर पर स्थित काराकुलम में वर्ष 2008 में लायी गई थी। इसके पौधे शुरुआत में कृषि विवि के वैज्ञानिकों को भी दिए गए थे, उन्होंने भी इस पौध को लगाकर उसकी उत्पादकता पर रिसर्च किया। अब इस प्रजाति को बढ़ावा देने के लिए काम किया जा रहा है। दक्षिण भारत में यह प्रजाति दो वर्ष में पांच बार फल देती है, जबकि उत्तर भारत में एक साल में एक बार ही फल देती है। अगेती होने के कारण बाजार में आ जाती है। वर्षा का भी इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
दिसंबर में लगती है कटिंग
दिसंबर और जनवरी माह में अंगूर की नयी प्रजाति पनीर द्राक्षी को लगाया जाता है। शुष्कता अवस्था में इसकी कटिंग लेते है। जिसमें तीन गांठ होती है। दो गांठ को जमीन में अंदर लगा देते हैं और एक गांठ को ऊपर रखते हैं। नमी बनाए रखते हैं। जो कि तापमान बढ़ने पर मार्च के महीने में उसमें नया प्रस्फूटन शुरू हो जाता। जिससे नयी नर्सरी तैयार हो जाती है। एक साल बाद तीन गुना तीन मीटर की दूरी पर इसे जनवरी माह में लगाया जाता है।
शराब बनाने में भी उपयोगी
उद्यान विभाग के प्रो. राजभर ने बताया कि इस प्रजाति को रस और मुनक्के के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं। वहीं, शराब बनाने में भी इसका प्रयोग होने से इसकी मांग बाजार में बढ़ रही है। यह प्रजाति वेस्ट यूपी के किसानों के लिए वरदान साबित होगी।
एक खेती पर न रहें निर्भर
किसानों को गन्ने और आलू के साथ अन्य खेती पर भी ध्यान देना चाहिए। अंगूर की नयी प्रजाति पनीर द्राक्षी अच्छी है। इसका लाभ किसानों को मिलेगा। किसानों को जागरूक करने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं। -डॉ. गया प्रसाद, कुलपति, कृषि विवि