एक जमाना था, जब अगर उत्तर प्रदेश में क्रिकेट की बात शुरू होती थी तो कानपुर के ग्रीन पार्क के इर्द-गिर्द ही चर्चा सिमट कर रह जाती थी। 2007 में प्रवीण कुमार (पीके) की भारतीय क्रिकेट टीम में दस्तक होती है। रेवड़ी, गजक, खेल उत्पाद, ज्वेलरी के लिए जाना जाने वाला मेरठ पहली बार देशभर में क्रिकेट को दमदार स्विंग गेंदबाज देने की वजह से सुर्खियां बनता है। इसके बाद से मेरठ की क्रिकेट ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। पीके से जितनी उम्मीद बंधी थी, भले ही उस पर वह खरे नहीं उतरे, लेकिन उनके पास ठीकठाक दिनों तक टेस्ट कैप रही। भुवनेश्वर कुमार (भुवी) अभी टीम इंडिया की बालिंग के धुरी हैं। फिलहाल रणजी में रेलवे की कप्तानी कर रहे कर्ण शर्मा को भी टेस्ट कैप हासिल करने का सौभाग्य मिल चुका है। अनुभवी क्रिकेटरों ने उनमें मशहूर लेगी शेन वार्न का अक्स देखा था। प्रियम गर्ग नई सनसनी हैं। उन्हें अंडर-19 वर्ल्ड कप में भारतीय टीम की कमान सौंपी गई है। वह विराट कोहली, मोहम्मद कैफ, पृथ्वी शॉ जैसे क्रिकेटरों की कतार में खड़े हो गए हैं। मेरठ से ही निकला निर्देश बैसोया जैसे क्रिकेटर ने 16 साल की उम्र में ही प्रथम श्रेणी मैच में एक पारी में पूरे 10 विकेट लेकर खलबली मचा दी।
क्रिकेट में मेरठ का यह उभार अनायास नहीं है। कोहरे से ढकी, ठंड से जकड़ी किसी भी सुबह विक्टोरिया पार्क, करन पब्लिक स्कूल, कैलाश प्रकाश स्टेडियम पहुंच जाइये। नेट पर पसीना बहा रहे लड़कों की लगन देखकर ऐसा लगेगा कि वह मौजूदा टीम इंडिया से किसी को बेदखल करके ही मानेंगे। मेरठ के इन खेल मैदानों की किस्मत भले ही मुंबई के शिवाजी पार्क जैसी न हो। जहां पवेलियन में बैठे सचिन तेंदुलकर, सुनील गावस्कर, दिलीप बेंगसरकर जैसे महान खिलाड़ी किसी की कवर ड्राइव, रिवर्स शॉट, हुक और पुल देखकर रीझ जाएं। पैड, ग्ल्ब्स, बैट बख्शीश में दे दें। भले ही अतहर अली, संजय रस्तोगी और विपिन वत्स की किस्मत और शोहरत रमाकांत आचरेकर जैसी नहीं है। पर मेरठ के खिलाड़ी अगर मुकाम पर पहुंचे हैं तो इन्हीं गुरुओं की खून-पसीने की मेहनत है। जिन्होंने गली क्रिकेट में टेनिस बॉल से शुरुआत करने वाले लड़कों को तराशकर स्विंग का सुल्तान बना दिया। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों में ऐसा आत्मविश्वास भरा कि वह अपने बच्चे को अभिजात्य वर्ग का खेल माने जाने वाले क्रिकेट का गुर सिखाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दे रहा है। भले ही उसे साइकिल पर दूध क्यों न बेचना पड़े।
स्पोर्ट्स में मेरठ की धमक सिर्फ क्रिकेट तक ही सीमित नहीं है। शहजर रिजवी, रवि कुमार जैसे शूटरों ने अपने निशाने से दुनिया को अचंभित किया है। डबल ट्रैप जैसी कड़ी शूटिंग प्रतिस्पर्द्धा में 16 साल के शार्दुल विहान ने एशियन गेम्स में सिल्वर और वर्ल्ड शूटिंग चैंपियनशिप में गोल्ड जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुका है। 10 मीटर एयर पिस्टल में अपनी उम्र से दोगुने पदक जीत चुके कलीना गांव के 17 वर्षीय शूटर सौरभ की सफलता तो किसी के लिए भी रश्क का विषय हो सकती है। यूथ ओलंपिक गेम्स और एशियन गेम्स से स्वर्णिम अभियान शुरू कर आईएसएसएफ शूटिंग वर्ल्डकप में स्वर्ण पदकों की झड़ी लगा चुका है। 2020 ओलंपिक में पूरे देश की उम्मीदें सौरभ पर टिकी हुई हैं। निमभन मध्यम वर्ग किसान परिवार के बेटे सौरभ की सफलता उसकी कड़ी परिश्रम और लगन का परिणाम है। संसाधन कम पड़े तो उसने घर में ही टार्गेट बनाया और अभ्यास में जुटा रहा।
जेवलिन में अन्नु रानी ने दिखाया दम
सरधना क्षेत्र के बहादरपुर गांव निवासी 27 वर्षीय जेवलिन थ्रोअर अन्नु रानी विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में क्वालीफाई करके दुनिया के बड़े खेल पंडितों को चौंका चुकी है। एशियन गेम्स और एशियन चैंपियनशिप में देश की झोली में पदक डाल चुकी अन्नु उम्मीदों का नया सितारा है। उभरती एथलीट रूपल चौधरी और तन्वी मलिक अपने शुरुआती प्रदर्शन से बता चुकी हैं कि आने वाला वक्त उनका है।
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