न्यायालय के फैसले से यह तो स्पष्ट हो गया है कि पूर्व में सरकार द्वारा जारी किया गया नगर निकायों का आरक्षण अब पूरी तरह बदल जाएगा। अगर हम मेरठ नगर निगम की ही बात करें तो मेरठ नगर निगम महापौर की सीट ओबीसी के लिए आरक्षित बताई जा रही थी। लेकिन यदि अब ओबीसी आरक्षण के बगैर चुनाव होता है तो यह सीट जनरल में जा सकती है। इसी प्रकार नगर निगम के 90 वार्डो का किया गया। आरक्षण भी नई व्यवस्था के साथ बदला नजर आएगा।
ओबीसी प्रत्याशियों की धरी रह जाएंगी तैयारियां
नगर निगम की महापौर सीट से लेकर वर्णों में पार्षद पद पर चुनाव लड़ने के लिए ताल ठोकने वाले ओबीसी वर्ग के प्रत्याशियों को अब मायूसी हाथ लगेगी कई प्रत्याशियों को जहां घर बैठना पड़ेगा। वहीं उनकी सभी तैयारियों पर पानी फिरता नजर आ रहा है। हाई कोर्ट के निर्णय ने नगर निगम ही नहीं, बल्कि नगर पालिका और नगर पंचायतों का चुनावी गणित ही बिगाड़ दिया है हालांकि हाईकोर्ट के निर्णय का सभी लोग स्वागत करने के लिए भी तैयार हैं।
बहुजन समाज पार्टी के जिला अध्यक्ष मोहित आनंद का कहना है कि हाई कोर्ट के निर्णय का स्वागत है लेकिन न्यायालय के निर्णय में क्या स्पष्ट है। इसकी जानकारी विधि विशेषज्ञों से बात करने के बाद ही पता चलेगी जिस प्रकार ओबीसी आरक्षण बगैर चुनाव करने का निर्णय लिया गया है। इससे लगता है कि मेरठ नगर निगम महापौर की सीट सामान्य कोटे में जाएगी।
आम आदमी पार्टी के जिला अध्यक्ष अंकुश चौधरी का कहना है कि हाई कोर्ट का जो निर्णय आया है वह अपनी जगह अलग स्थान रखता है लेकिन अगर सरकार एक बड़े वर्ग ओबीसी को नजरअंदाज करके निकाय चुनाव कराती है तो इसका खामियाजा भी सरकार को भुगतना पड़ेगा। लोकतंत्र में सभी के साथ होने से खूबसूरती होती है।
नगर निगम, निकाय चुनाव पर अदालत का फैसला, सरकार द्वारा हाई कोर्ट में जानबूझकर लचर पैरवी का नतीजा है, सरकार पिछड़ों को सत्ता में अधिकार देना नहीं चाहती और पिछड़ों के आरक्षण को खत्म करना चाहती है। -राजपालसिह एडवोकेट- जिलाध्यक्ष निवर्तमान समाजवादी पार्टी
सरकार पिछड़ों और अनुसूचित जाति के लोगों के खिलाफ है। उन्हें सत्ता में अधिकार नहीं देना चाहती है। ओबीसी का आरक्षण होना चाहिए था, लेकिन सरकार द्वारा हाई कोर्ट में जानबूझकर लचर पैरवी की गई। सरकार पिछड़ों के आरक्षण को खत्म करना चाहती है। - सपा के सरधना से विधायक अतुल प्रधान