ऐ लापरवाह सिस्टम तूने तो मुझे भी कलंकित कर दिया। आखिर मेरा इसमें कसूर क्या था। मैं तो समुद्र के किनारे स्थित भगवान जगन्नाथ की नगरी पुरी से चलकर गंगा की पावन पवित्र नगरी हरिद्वार तक लोगों को उनका सफर कराती हूं। लेकिन मेरे नाम पर ऐसा कलंक लगा, जिसे शायद ही भूला जा सके। एक या दो नहीं बल्कि 23 लोगों की मौत को काल ने निगल लिया।
मासूम हो या फिर महिला, पता नहीं अलग अलग राज्यों में कितने घरों के लोग मुझे किस नीयत से देख रहे होंगे। जिनके घर में पिछले तीन दिनों से चूल्हे तक नहीं जले हैं। अस्पताल में जहां भी जो लोग भर्ती हैं वहां उनकी चीख पुकार मची है। देश में इतना लंबा सफर मैं तय करती हूं, कि चलने के बाद देश की राजधानी दिल्ली से होकर हरिद्वार तक पहुंचने में मुझे दो दिन का समय लगता है। पता नहीं कितनें दिनों से लोगों को मेरा इंतजार रहता था, अब मेरी रफ्तार को आंका जा रहा हो। शनिवार शाम को खतौली में अपने ही लापरवाह सिस्टम ने मुझे ऐसा दर्द दिया दिया की पलभर में मैं क्षतिग्रस्त हो गई। शवों के ढेर लग गए। घायलों की चीखती चिल्लाती आवाज को मैं सुनती रही। इस सिस्टम की लापरवाही से पूरा सरकारी तंत्र मेरे इर्दगिर्द नजर आया। ऐसे जख्म मुझे मिले हैं जिनके घाव मुझे लंबे समय तक दर्द देते रहेंगे। कभी कोहरे की परवाह नहीं की तो आंधी और बारिश भी सहन करने से पीछे नहीं हटी। शनिवार की उस शाम जब मेरे पथ पर कटी हुई लाइन को जोड़ा जा रहा था, तो मैं क्या समझ पाती। मुझे खींचने वाला इंजन और पांच कोच बाधित राह को पार कर चुके थे, लेकिन उसके बाद ट्रैक की राह से मैं बिखरती चली गई। जब तक यह सिस्टम अपनी चूक पर आंख खोलकर झांकता उससे पहले मुझे पर यह कलंक लग चुका था। करोड़ों का नुकसान मेरे ऊपर थोंप दिया गया, इसे भले ही हादसा कहा जाए, लेकिन व्यवस्था का यह सामूहिक कत्ल है।
यहां से गुजरती है
कलिंग उत्कल एक्सप्रेस उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीमाओं में प्रवेश होकर जाती है। जिसे पुरी से चलने में हरिद्वार तक दो दिन का वक्त लगता है। उसके बाद वापस हरिद्वार से पुरी जाती है।
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