शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह व्रत रखा जाता है। पहले तो केवल पुत्र संतानों के लिए ही व्रत को रखा जाता था, लेकिन आज के समय में कन्याओं के लिए भी व्रत रखा जाने लगा है। आज शाम 4:18 से सांय 7:18 तक पूजन का शुभ मुहूर्त है। व्रत करने वाली माताएं इस मुहूर्त में पूजन कर सकती हैं।
दीवार पर चित्र बनाने की है प्राचीन परंपरा
अहोई अष्टमी पर दीवार पर मां अहोई का स्वरूप बनाकर विधि-विधान से पूजा अर्चना करने की प्राचीन परंपरा है। वर्तमान में समय के अभाव में दीवार पर चित्र बनाने की परंपरा कम हुई है। बाजारों में मां अहोई के सुंदर कलेंडर बिक रहे हैं, जिनको महिलाओं ने खरीदकर दीवारों पर लगाया है।
संतान के जन्म से ही तैयार की जाती है चांदी के मोतियों की माला
संतान होने पर चांदी के मोतियों की एक माला बनाई है। मोती को स्थानीय भाषा में सेव कहते हैं। प्रत्येक वर्ष अहोई अष्टमी के दिन दो सेव माला में डाल दिये जाते हैं।
वर्ष- वृद्धि के साथ-साथ माला के मोती भी बढ़ने लगते हैं। इस माला को अष्टमी से लेकर दीपावली तक माताएं अपने गले में पहनती हैं, जितनी संताने होती है, उतनी ही मालाएं तैयार की जाती हैं।
मां अहोई के चित्र और मूर्ति के समक्ष रखा जाता है जल से भरा पात्र
अहोई माता की मूर्ति के पास एक जल पात्र रखा जाता है जिसको स्थानीय भाषा में करवा कहते हैं। अहोई पर विशेष रूप से पूड़े या गुलगुले बनाए जाते हैं। भगवती अहोई के स्वरूप के समक्ष जल से भरे पात्र को रखकर, दीपक-धूप जलाकर भगवती अहोई की पूजा की जाती है।
मां को पूड़े या गुलगले का भोग लगाया जाता है, जिसे बाद में प्रसाद के रूप में बांट दिया जाता है। इसके साथ ही माताएं बायना निकालकर घर की बड़ी महिलाओं को देती हैं। शाम को तारों को देखकर व्रत खोलती हैं।