गन्ना मूल्य भुगतान और किसानों की अन्य समस्याओं को लेकर आंदोलन होते रहे हैं, लेकिन शुक्रवार को हुआ आंदोलन कई मायनों में अलग था। आंदोलन के जरिए कृषि विधेयकों के साथ केंद्र की नीतियों का भी विरोध किया गया। लंबे अरसे के बाद आपसी मतभेदों के दरकिनार कर किसान संगठन एक साथ आए और चक्का जाम में शामिल हुए।
इस तरह की एकजुटता तीन दशक पहले डंकल प्रस्ताव और विश्व व्यापार संगठन के प्रावधानों के विरोध में देखने को मिली थी। किसानों की यह नाराजगी आने वाले दिनों में केंद्र और प्रदेश सरकार के सामने समस्या खड़ी कर सकता है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांव सिसौली से निकलकर देशभर के किसानों की आवाज बनी भारतीय किसान यूनियन और उसके अध्यक्ष महेंद्र सिंह टिकैत को करमूखेड़ी बिजलीघर पर हुए आंदोलन से पहचान मिली थी। एक मार्च 1987 को बिजली की दरों में वृद्धि के विरोध और बिल माफ करने की मांग को लेकर बिजलीघर पर धरना देने जा रहे किसानों पर पुलिस ने फायरिंग कर दी थी, इसमें दो किसान जयपाल और अकबर अली की मौत हो गई थी।
11 अगस्त को सिसौली में हुई महापंचायत में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह पहुंचे और बिजली बिलों को माफ करने की घोषणा की थी। इसके बाद भाकियू ने जनवरी 1987 में 25 दिन तक मेरठ कमिश्नरी पर धरना दिया, मार्च 1998 में मुरादाबाद के रजबपुर में सत्याग्रह किया। वोट क्लब दिल्ली पर धरना, खैर का आंदोलन, 1989 ९ में नईमा अपहरण कांड को लेकर मुजफ्फरनगर के भोपा का धरना, स्थानीय समस्याओं के साथ डंकल के विरोध में भी भाकियू मुखर हुई।
नए संगठन भी बने, राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन ने भी पहचान बनाई है। भाकियू (अखंड), आजाद किसान यूनियन, भाकियू भानु, भाकियू अंबावता आदि तमाम संगठन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है, जो इस मुद्दे पर एकजुट हैं।
चक्का जाम तो बानगी है
तीनों विधेयक किसानों की बर्बादी के लिए लाए गए हैं। सरकार ने किसानों से उनकी बेहतरी के लिए वोट मांगकर सत्ता हासिल की है, लेकिन काम पूंजीपतियों के लिए हो रहे हैं। किसान सब देख रहा है। चक्का जाम तो बानगी भर है। आगे इससे भी बड़े आंदोलन होंगे।
- सरदार वीएम सिंह, राष्ट्रीय संयोजक, राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन
किसान सड़कों पर आंदोलन करेंगे
किसान संगठनों ने एकजुट होकर देशभर में चक्का जाम कर सरकार को दिखा दिया है कि किसान अपना डेथ वारंट नहीं निकलने देगा। सरकार को ये काला कानून वापस लेना होगा। गन्ने का रेट नहीं बढऩे, बढ़ी बिजली दरें वापस नहीं होने और समय से मिल नहीं चलने पर किसान सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेंगे।
- चौधरी राकेश टिकैत, राष्ट्रीय प्रवक्ता भाकियू