भगवान भोलेनाथ का ध्यान जब हम करते हैं तो सावन का महीना रुद्राभिषेक और कांवड़ का उत्सव आंखों के सामने आता है। सावन शुरू होते ही हरिद्वार जाने वाले कांवड़ियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जाती है। मेरठ से रोज दिल्ली, राजस्थान और आसपास के इलाकों के कांवड़िए गुजर रहे हैं। बस अड्डों पर कांवड़ियों की भीड़ बढ़ रही है। जैसे-जैसे जलाभिषेक का दिन नजदीक आता जाता है वैसे वैसे कांवड़ियों का सैलाब उमड़ पड़ता है। यह कांवड़ हमें आध्यात्मिक जिम्मेदारी का एहसास कराती है।
अलग-अलग है मान्यताएं
ऐसी मान्यता है कि सर्वप्रथम भगवान परशुराम ने कांवड़ लाकर बागपत के पुरा महादेव पर भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। यहां अब भी हर साल लाखों शिवभक्त जलाभिषेक करते हैं। वहीं यह भी मान्यता है कि कांवड़ की परंपरा श्रवण से शुरू हुई थी। जिसने अपने नेत्रहीन माता-पिता की इच्छानुसार गंगा स्नान करवाया था। श्रवण अपने माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार लेकर गए थे।
कांवड़ का ये है आध्यात्मिक महत्व
- कांवड़ियों द्वारा पवित्र जल से रौद्र रूप को भी शांत करता है। जिससे शिव की संहारक शक्ति, विष्णु की पालक और ब्रह्मा की सृजन शक्ति बन जाती है।
- सावन में शिव का जलाभिषेक शिव के रोम-रोम को पुलकित करता है। जिससे संसार का वातावरण कल्याणमय हो जाता है और श्रद्धालुओं की मन्नतें पूरी होती हैं।
ऐसी कांवड़ लाते हैं शिवभक्त
झूला कांवड़
इस कांवड़ को पेड़, बांस या बल्लियों पर झुलाया जाता है। इसको जमीन पर नहीं रखा जाता।
बैकुण्ठी कांवड़
बैकुंठी कांवड़ को जमीन पर रख सकते हैं, लेकिन पवित्र स्थान देखकर।
खड़ी कांवड़
इस कांवड़ को हर समय कंधे पर ही रखना पड़ता है। आराम करते समय दूसरे भक्त को कांवड़ कंधे पर लेकर खड़ा रहना पड़ता है।
झांकी कांवड़
हाल में झांकी कांवड़ का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इसे शिवभक्त वाहनों पर झांकी कांवड़ लाते हैं। इसके अलावा दंडवत कांवड़ का संकल्प लेने वाले शिवभक्त लगभग तीन से पंद्रह किमी तक दंडवत जाकर शिवालय में जलाभिषेक करते हैं।
डाक कांवड़
डाक कांवड़ में दस से तीस भोले भक्त एक निश्चित समय में कांवड़ लाने का संकल्प लेते हैं। इनमें एक-एक कर सदस्य जल लेकर दौड़ता है। जब एक शिवभक्त थक जाता है तो दूसरा जल लेकर दौड़ता है। इसमें प्राय: 9 से 24 घंटे के अंदर जल चढ़ाने का संकल्प लिया जाता है।
ऐसे करते हैं नियमों का पालन
- जल उठाते समय कांवड़िए भगवान शिव, मां गंगा और कांवड़ की पूजा-अर्चना करके आरती उतारते हैं।
- जो भक्त समूह में कांवड़ यात्रा करते हैं वे नेतृत्व करने वाले व्यक्ति को गुरु के रूप में चुनकर उसके आदेश का पालन करते हैं।
- कांवड़ उठाने से लेकर जल चढ़ाने तक प्रत्येक दिन सुबह-शाम कांवड़ की पूजा करते हैं।
- मादक और तामसिक पदार्थ का सेवन नहीं करते।
- शिवभक्त जलाभिषेक तक जमीन पर ही सोते हैं।