मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय कुलपति और रजिस्ट्रार के विवाद में अखाड़ा बनता जा रहा है। कुलपति की प्रेस कांफ्रेंस के एक दिन बाद ही रजिस्ट्रार मनोज सिंह ने कार्यालय आदेश जारी कर कर्मचारियों को अपने अधीन बताया है। साथ ही कहा है कि हमारी नियुक्ति शासन से हुई है, कुलपति हमें नहीं हटा सकते। वहीं कुलपति ने आरोप लगाया कि मनोज सिंह रजिस्ट्रार के नाम पर जबरदस्ती कर रहे हैं। शासन इसे चुपचाप देख रहा है।
रजिस्ट्रार ने कार्यालय आदेश में कहा है कि राज्य विवि अधिनियम 1973 और उत्तर प्रदेश विवि केंद्रीयकृत सेवा नियमावली 1975 की संगत धाराओं और नियमों के अंतर्गत विवि में कुलसचिव, उपकुलसचिव और सहायक कुलसचिव की नियुक्ति और स्थानांतरण आदि का अधिकार शासन को है। मेरठ विवि की प्रथम परिनियमावली के परिनियम 2.06 के अनुसार विवि के सभी कर्मचारियों (लाइब्रेरियन, एकाउंट, ऑडिट सेक्शन, शिक्षक और अधिकारियों को छोड़कर) पर रजिस्ट्रार का नियंत्रण होगा। यह कार्यालय आदेश कुलपति समेत अन्य अधिकारियों, विभागाध्यक्षों और कॉलेज के प्राचार्यों को भेजा गया। प्रोफेसर नवीन चंद्र लोहनी को भी आदेश की प्रति भेजी गई। प्रो. लोहनी को कुलपति ने दीक्षांत समारोह से पहले रजिस्ट्रार नियुक्त किया था। प्रति में प्रो. लोहनी के लिए कहा गया कि उन्होंने वाहन चालक, कार्यालय कर्मचारियों को धमकाकर शिक्षक पद का दुरुपयोग किया और सरकारी कार्य में जानबूझकर बाधा डाली। कुलपति विक्रम चंद्र गोयल का कहना है कि मनोज सिंह अनाधिकृत चेष्टा कर रहे हैं। वह यहां जबरदस्ती बैठे हैं। उन्हें ज्वाइन नहीं कराया गया। उन्होंने बताया कि पूरे मामले से मुख्यमंत्री को अवगत कराया गया है, अगर मनोज सिंह का रजिस्ट्रार रहना आवश्यक है तो सीएम इस बारे में आदेश जारी कर दें। वह कुलाधिपति को इस्तीफा भेज देंगे।
शासन और राजभवन कब तक देखेंगे तमाशा
सवाल यह है कि शासन और राजभवन कब तक कुलपति और रजिस्ट्रार के विवाद का तमाशा देखेंगे। विवि की फजीहत हो रही है और काम ठप हैं। ऐसे तो विवि पूरी तरह से पटरी से उतर जाएगा।
करीब छह महीने से कुलपति और रजिस्ट्रार के बीच साइलेंट वार चल रही है। छात्रों के काम अटकते रहे। रिजल्ट में देरी हुई। एडमिशन प्रक्रिया पर भी इसका असर पड़ा। अब खुलकर दोनों अधिकारी एक-दूसरे के सामने आ गए हैं। ये भी तय है कि दोनों अब साथ-साथ काम करने वाले नहीं हैं। शासन ने जहां मनोज सिंह को ज्वाइन करने का आदेश दिया है, वहीं कुलपति ने ज्वाइन न कराकर और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर अपना स्टैंड साफ कर दिया है। शासन की चुप्पी विवि को भारी पड़ रही है। कुलाधिपति के संज्ञान में भी मामला है। उनके स्तर से भी अभी कुछ नहीं किया गया। विवाद दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। मनोज सिंह द्वारा कर्मचारियों को कार्यालय आदेश जारी करने के बाद स्थिति और बिगड़ने वाली है। कुलपति का कहना है कि उन्होंने मेहनत करके विवि को सुधारा है। वह रजिस्ट्रार के साथ काम नहीं कर सकते। रजिस्ट्रार ने ज्वाइन नहीं कराने पर जबर्दस्ती दिखाई। वह शासन के पास जाने की जगह जबरन आकर ऑफिस बैठने लगे।
रिलीव बना है हथियार
कुलपति और रजिस्ट्रार के बीच रिलीव करना हथियार बना है। विवि के डिप्टी रजिस्ट्रार प्रभाष द्विवेदी के साथ यह हो चुका है। कुलपति ने दीक्षांत समारोह के धन्यवाद कार्यक्रम में कहा था कि प्रभाष द्विवेदी को कांशी विद्यापीठ विवि के कुलपति ने रिलीव कर दिया था। शासन के आदेश पर ज्वाइन नहीं कराया गया। मामला फिर शासन के पास गया। कुलपति ने फिर भी ज्वाइन नहीं कराया। बाद में राजभवन ने दखल दिया और उनका ट्रांसफर कर दिया गया।
विवि की नियमावली के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। कुलपति और रजिस्ट्रार दोनों के अपने अधिकार हैं। शासन के आदेश को कुलपति को मानना चाहिए। दोनों अधिकारियों को छात्रहित और विवि हित में मामले को सुलझाना चाहिए। - डॉ. ईशपाल सिंह, मूटा अध्यक्ष
कुलपति और रजिस्ट्रार ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए हैं। जल्द एक जांच कमेटी गठित करनी चाहिए। जिस पर आरोप सिद्ध हो जाएं उसे विवि छोड़कर चले जाना चाहिए। - राजदीप विकल, छात्रसंघ अध्यक्ष, सीसीएसयू