मेरठ। खरखौदा कांड के बाद लव जेहाद पर मुखर भाजपा में आपस में ही खींचतान नजर आने लगी है। प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी के लव जेहाद के खिलाफ मुहिम को उनकी ही पार्टी के लोगों से झटका लगा है। वह खुद आगे बढ़कर इस मुद्दे को उठा रहे थे, या ऊपर से इशारा था? बात चाहे जो हो, लेकिन इस मुद्दे पर हो रही खींचतान को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के सिंहासन से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के करीबी होने के साथ ही कई अन्य बातें वाजपेयी के पक्ष में बताई जा रही हैं।
डॉ. वाजपेयी ने खरखौदा कांड को लव जेहाद से जोड़ते हुए इस मुद्दे को हवा दी थी। इसके बाद से इस पर लंबी बहस शुरू हो गई थी। रविवार को वृंदावन में प्रदेश कार्यसमिति के सम्मेलन में भी इस पर चर्चा कराने की बात प्रदेश अध्यक्ष ने कही थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
लव जेहाद पर संघ का भी निर्देश:
सूत्रों की मानें तो लव जेहाद और छेड़छाड़ के मुद्दे पर संघ ने दिशा-निर्देश जारी किया है। संघ का मानना है कि यह हॉट इश्यू है और जनता से सीधे जुड़ा है। लेकिन इसे सियासी रूप से आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। इसके लिए संघ ने भाजपा को पीछे कर विहिप, बजरंग दल, विद्यार्थी परिषद और भाजयुमो का संयुक्त मोर्चा बनाने की रणनीति तैयार की है। शायद यही कारण है कि प्रदेश कार्यसमिति की बैठक से लव जेहाद का एजेंडा गायब हो गया। वहीं एक पक्ष का मानना है कि इस मुद्दे पर वाजपेयी ने राष्ट्रीय नेतृत्व से रायशुमारी नहीं की। पार्टी वरिष्ठ नेता इस मुद्दे को ज्वलंत तो मानते हैं, लेकिन आम आदमी को जोड़ने वाला नहीं।
वाजपेयी का सिंहासन हिलाना आसान नहीं:
डॉ. वाजपेयी इस समय प्रदेश के अधिकांश वरिष्ठ नेताओं की आंखों की किरकरी बने हैं। पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह से छत्तीस का आंकड़ा किसी से छिपा नहीं है। बावजूद इसके कुछ बातें हैं, जो उन्हें भारी साबित कर रही है। वाजपेयी की छवि कट्टर हिंदूवादी की है। कार्यकर्ताओं के बीच आसानी से रम जाते हैं। उनका जुझारूपन कार्यकर्ताओं को भा रहा है। इसके अलावा वाजपेयी के प्रदेश अध्यक्ष के कार्यकाल पर नजर डालें तो उनके नेतृत्व में सबसे पहले स्थानीय निकाय चुनाव हुए, जिसमें भाजपा ने परचम लहराया। इसके बाद लोकसभा चुनाव में भले ही मोदी फैक्टर रहा हो, लेकिन रैलियों की सफलता के बीच 73 सीटों पर जीत में उनकी सहभागिता से इनकार नहीं किया जा सकता। पार्टी हित की बात करें तो लखनऊ स्थित प्रदेश कार्यालय का जो मासिक खर्च पहले 50 से 55 लाख रुपये होता था, अब वह सिर्फ 17 से 18 लाख रुपये है।