कहते हैं कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा में स्नान करने मात्र से जहां चारों वेदों को पढ़ने का संपूर्ण लाभ प्राप्त होता हैं, वहीं गंगा में दीपदान और पिंडदान करने से पितृों की आत्मा को भी शांति मिलती हैं। सच्चे मन से क्षमा याचना करते हुए डुबकी लगाने से पाप भी धुल जाते हैं। इतने सारे पुण्य जब गंगा में मात्र स्नान से मिलते हो तो श्रद्धालुओं का गंगा स्नान के लिए उत्साहित होना लाजिमी है। यही कारण है कि 28 नवंबर को स्नान के मुख्य पर्व से चार-पांच दिन पहले से ही श्रद्धालु तंबू और खाने पीने के इंतजाम के साथ भैंसा बुग्गी, ट्रैक्टर ट्रॉलियों और अन्य वाहनों में सवार होकर स्नान के लिए गंगा की तरफ बढ़ चले हैं।
सरधना। कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान को लेकर लोग काफी उत्साहित हैं। मजदूर और किसान क्या गंगा मेले के उत्साह में हर वर्ग का श्रद्धालु अपनी खेतीबाड़ी और अन्य कामकाज की चिंता भूल गया है। श्रद्धालु परिवार के संग भैंसा बुग्गी और ट्रैक्टर ट्रालियों में सवार होकर गंगा के विभिन्न घाटों पर लगने वाले मेले में जा रहे हैं। मकदूमपुर गंगा मेले का शुक्रवार को शुभारंभ हो गया है, जबकि गढ़ मेला पहले ही शुरू हो चुका है। मुख्य स्नान 28 नवंबर को है, लेकिन श्रद्धालु चार-पांच दिन पहले से ही गंगा घाट की ओर कूच कर रहे हैं। ताकि मनपसंद स्थान पर तंबू लगाकर मेले का आनंद उठा सके। शनिवार को दबथुवा, बहादरपुर, पौहल्ली, नानू, रतौली, पाथौली, भलसौना, छुर, गढ़ी, भूनि, सरूरपुर से कई दर्जन बुग्गियां और ट्रैक्टर ट्राली गंगा घाट की ओर रवाना हुई। मेरठ-करनाल हाईवे पर इन बुग्गियों के कारण जाम के हालात रहे।
माछरा क्षेत्र में गढ़ गंगा मेले में गंगा स्नान के लिए लोगों में उत्साह देखा जा रहा है। यहां गंगा घाट पर आस्था के साथ-साथ भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपरा भी देखने को मिलती है। मेला क्षेत्र में सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु परिवार के साथ डेरा डाले हुए हैं। मेले की तैयारी में लगे माछरा गांव के अशोक त्यागी मुंशी जी का कहना है कि हमारे समाज में संयुक्त परिवार की परंपरा आज भी जीवित है। वहीं, जगतवीर सिंह का कहना है कि उनके तीन बेटे हैं। अपने कारोबार की वजह के कारण तीनों बाहर अलग-अलग जिलों में रहते हैं, लेकिन गंगा स्नान पर्व पर जरूर आते हैं।