खेती की पुरानी पद्धति अपनाने पर जोर देगा कृषि विभाग
बिजनौर। खेतों के लगातार दोहन, घटती उर्वरकता और अनापशनाप मात्रा यूरिया व कीटनाशकों के प्रयोग से गड़बड़ाती धरती की सेहत, ये ऐसे कारण है, जिन्होंने कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विभाग को सोचने पर मजबूर कर दिया है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि खेती की पुरानी पद्धति पर लौटने की तैयारी है। शासन ने शासनादेश जारी कर किसानों को पुरानी पद्धति पर लौटने के लिए जागरूक करने को कहा है।
जिले के बासमती धान में इतना अधिक पेस्टीसाइड प्रयोग किया गया कि गत वर्ष विदेशों ने जिले का बासमती चावल खरीदने से मना कर दिया था। केंद्र व प्रदेश सरकार खेतों में पेस्टीसाइड का प्रयोग कम करने व उत्पादन बढ़ाने के लिए काफी कोशिश कर रही है। इस संबंध में कराए गए सर्वे में यह बात सामने आई है कि फसलों में बीमारी खेती की पद्धति बदलने से आई है। आज खेती तीन दशक पहले की जा रही खेती से एकदम अलग हो गई है। किसान फसलों की देखभाल तो कर रहे हैं, लेकिन खेतों पर ध्यान देना छोड़ दिया है। इस कारण खेती में रोग भी बढ़ रहे हैं और खेतों की उर्वरक क्षमता भी खत्म हो रही है। जिला कृषि अधिकारी अवधेश मिश्रा के अनुसार किसानों को पुरानी पद्धति के अनुसार खेती करने के लिए फिर से जागरूक किया जा रहा है। किसान फसल चक्र अपनाएं और कुछ समय के लिए अपने खेतों को खाली छोड़ें। खेत की मिट्टी की भी फसलों को पैदा करने की एक सीमा है, पेस्टीसाइड का प्रयोग करके इस सीमा को पार करने की कोशिश न करें।
इस कारण बदली खेती
पहले भारत की जनसंख्या कम होने के बाद भी खाद्यान्न की कमी थी। देश की जनता के लिए खाद्यान्न बाहर से मंगवाया जाता था। 70 के दशक में देश में फसल क्रांति की शुरुआत हुई। फसलों का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया गया। 80 के दशक के बाद सघन खेती की शुरूआत हुई। फसलों को रबी, खरीफ, जायद में वर्गीकृत किया गया। फसलों के उत्पादन पर तो जोर दिया गया, लेकिन गुणवत्ता में सुधार बनाए रखने की कोशिश नहीं की गई।
यह है पुरानी और नई खेती में फर्क
पहले किसान धान, चारे आदि की फसल बोने के लिए गर्मियों में खेतों को खाली छोड़ते थे। तब खेतों की कई बार जुताई की जाती थी। इससे हानिकारक कीट या तो धूप में नष्ट हो जाते थे या पक्षी उन्हें निवाला बना लेते थे। लेकिन अब किसान दो महीने भी खेतों को खाली नहीं छोड़ रहे हैं। नतीजतन खेतों में हानिकारक कीट पनपने लगते हैं।
फसल चक्र छूटा
तीन दशक तक किसान फसल चक्र को अपनाते थे। एक फसल के बाद फसल की प्रजाति बदल दी जाती थी। इससे खेतों में पोषक तत्वों की कमी नहीं होती थी। लेकिन किसान अब एक खेत में सालों तक एक ही फसल बोते हैं। इससे पोषक तत्वों की संख्या लगातार घटती रहती है।
जैविक खेती भी बंद हुई
पहले किसानों की सबसे बड़ी जीत गोबर की खेती थी। खेतों में काफी संख्या में गोबर का खाद डाला जाता था। लेकिन अब गोबर के खाद की कमी है। गोबर के खाद की कमी को पेस्टीसाइड से पूरा करने की कोशिश की जा रही है। इस कोशिश में खेतों से केंचुए भी खत्म होने लगे हैं।