अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ।
गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में जो हुआ उस पर पूरा देश रोष जता रहा है। नन्हें प्रद्युमभन क ी हत्या के बाद इस पर सोचने भर से ही अभिभावकों के रोंगटे खड़े हो रहे हैं। निजी स्कूलों में सुरक्षा क ी इस हकीकत से रूबरू होने के बाद अभिभावकों को डर है कि जो घटना गुरुग्राम में हुई वो कहीं मेरठ में न हो जाए। महंगी फीस देने के बाद स्कूल में उनके बच्चे की सुरक्षा क ी गारंटी शून्य है। अभिभावक अच्छी शिक्षा और सुरक्षा के नाम पर स्कूलों को मोटी फीस देते हैं, लेकिन स्कूलों का हाल यह कि वहां कोई भी चला जाए और किसी घटना को अंजाम देकर चला आए। शहर के एक नामचीन विद्यालय में पिछले दिनों ही बच्ची को बाहरी लोगों ने घुसकर हंटर से मारा। अन्य विद्यालयों का भी लगभग यही हाल है, लेकिन बच्चे के करियर की सोचकर बात बाहर नहीं आ पाती।
बातचीत--
स्कूल बसों में नहीं होती चेकिंग
शहर के अधिकांश स्कूलों में ट्रांसपोर्टेशन का ठेका दिया है। स्कूल बसों के कंडक्टर, ड्राइवर के बारे में स्कूलों को स्वयं पता नहीं होता। स्कूलों के पास केवल ठेकेदार की जानकारी होती है, कंडक्टर, ड्राइवर कौन है स्कूल खुद नहीं जानते। -प्रिंस जैन
सिर्फ नाम की सुरक्षा
स्कूल सिर्फ फीस लेने वाली संस्था बन चुके हैं। सीबीएसई ने खुद गाइड लाइन दी है कि स्कूल बस के ड्राइवर, कंडक्टर के पास एंड्रायड सेट न हो, वो वर्दी में हों लेकिन कोई स्कूल इस पर ध्यान नहीं देता। इसका परिणाम गुरुग्राम के स्कूल में बच्चे की हत्या जैसा ही होता है। -मनुल
सीसीटीवी का नहीं उचित इंतजाम
स्कूलों के गेटों पर दिखाने के लिए सीसीटीवी लगे हैं, लेकिन अंदर कोई इंतजाम नहीं जहां ऐसी घटनाएं होती हैं। गुरुग्राम में भी घटनास्थल के पास सीसीटीवी नहीं था। पिछले दिनों शहर के एक विद्यालय में छात्रा को हंटर से मारने की घटना वाली जगह पर भी सीसीटीवी नहीं था। -विनेश जैन
स्कूल भेजने से लगता डर
बच्चों के साथ स्कूलों में जो सुलूक और घटनाएं हो रही हैं, उससे मन बहुत घबराने लगा है। बच्चाें को स्कूल भेजने से डर लगता है। फीस देकर भी हमारे बच्चे सुरक्षित नहीं। उनकी सुरक्षा की कोई भी गारंटी स्कूलों में नहीं हैं। -सुहानी अग्रवाल
कौन से स्कूल पर करें भरोसा
अभिभावक समझते हैं निजी स्कूलों में ज्यादा फीस देने से बच्चे सुरक्षित रहेंगे। उन्हें अच्छी पढ़ाई मिलेगी, जो सरकारी स्कूल नहीं दे पाते। जब निजी स्कूलों में यह हालात हैं तो डर लगता है बच्चों को कहां भेजें। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती, निजी स्कूलों में सुरक्षा नहीं हैं। -डॉ. अंकिता जैन
अभिभावकों पर रहता दवाब
शहर के स्कूलों में आए दिन ऐसी घटनाएं होती हैं। लेकिन वो सामने नहीं आ पाती, क्योंकि बच्चों के करियर के नाम पर स्कूल इतना दवाब बना देते हैं कि अभिभावक कुछ कह नहीं पाते। पब्लिक स्कूल आपराधिक घटनाओं का अड्डा बन गए हैं। -अमित जैन
अभिभावक बाहर, बाहरी लोगों को स्कूल में एंट्री
स्कूलों में प्राइवेसी और सुरक्षा के नाम पर अभिभावकों को गेट के बाहर रहने दिया जाता है। लेकिन हथियार लेकर ऐसे अपरिचित लोग स्कूलों में घुस जाते हैं। वारदात कर देते हैं उन पर कोई रोक नहीं। अभिभावक को ये भी नहंी बताया जाता कि बच्चे क ा क्लासरूम कहां है। -दिनेश
बस चालक करते हैं मनमानी
स्कूलों की बसों के लिए स्पीड का मानक तय है। नियम भी बने हैं लेकिन स्कूलों का ध्यान इस ओर कभी नहंी रहता। बच्चा खुद बस में बैठता है, उतरता है कंडक्टर, हेल्पर मदद नहीं करते। लेकिन फीस पूरी लगती है। बस चालक मनमाने ढंग से बस चलाता है। -प्रदीप गुप्ता
केवल नाम की सुविधाएं
स्कूलों में केवल नाम की सुविधाएं हैं। स्कूल बच्चों पर ध्यान दें तो शायद गुरुग्राम जैसा हादसा नहीं होता। पैरेंट्स टीचर मीटिंग में शिक्षक केवल बच्चे की कमियां गिनाते हैं, अगर हम लोग कुछ कहना चाहें तो स्कूल प्रबंधन सुनता नहीं। हर साल फीस बढ़ती रहती है। -शोभित बंसल