शहर में खतरनाक स्तर तक पहुंच चुके प्रदूषण और यातायात व्यवस्था पर एनजीटी की सख्ती से विभागों की हलचल तेज हो गई है। लेकिन, सभी पुराना राग ही अलाप रहे हैं। एमडीए अफसरों का कहना है कि वे जमीन देने को तैयार हैं पर मुफ्त में नहीं। वहीं परिवहन अफसर कह रहे हैं कि बस अड्डों को शहर से बाहर करने के फैसले पर लखनऊ मुख्यालय से ही फैसला हो सकता है। विभागों के इस द्वंद्व के बीच 650 रोडवेज बसों के धुएं से शहर का दम घुट रहा है।
दरअसल, एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) की सख्ती के बाद एक बार फिर रोडवेज बस अड्डों को शहर से बाहर शिफ्ट करने पर बहस तेज हो गई है। शहर के बीच चल रहे बस अड्डों को बाहर करने के लिए काफी दिनों से मशक्कत चल रही है। इसे लेकर कई बार सर्वे हो चुका है। मंडलायुक्त आलोक सिन्हा के निर्देश पर गठित टीम कई बार जमीन देख चुकी है। विकल्प भी तलाशे गए, लेकिन बस अड्डे नहीं हटे। इन कवायदों के बीच परिवहन निगम के अधिकारी अब भैसाली बस अड्डे को नए सिरे से बनाने की तैयारी में जुटे हैं। शहर के बीच स्थित इस बस अड्डे से दिल्ली रोड पर दिनभर जाम लगा रहता है। इस कारण शहर में प्रदूषण का स्तर भी लाल निशान से ऊपर पहुंच रहा है। इसके खिलाफ समाजसेवी लोकेश खुराना ने एनजीटी का सहारा लिया। इस पर एनजीटी ने नोटिस जारी कर पूछा है कि आखिर बस अड्डों को बाहर क्यों नहीं किया गया। एनजीटी ने केंद्र सरकार, केंद्रीय एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, एमडीए और यूपीएसआरटीसी को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में जवाब देने को कहा है।
एमडीए को मिला नोटिस
एनजीटी का नोटिस मिलने के बाद एमडीए जवाब देने की तैयारी में जुट गया है। एमडीए वीसी योगेंद्र यादव के मुताबिक, एमडीए ने महायोजना में बस अड्डों के लिए जमीन उपलब्ध कराई है। इस संबंध में परिवहन निगम के अधिकारियों को कई बार पत्र लिखा जा चुका है कि जमीन ले लें। अधिकारी मौके पर जाकर जमीन भी देख चुके हैं, लेकिन अब तक किसी फैसले से हमें अवगत नहीं कराया है। एमडीए अधिकारियों का कहना है कि हमें मुफ्त में जमीन देने का अधिकार नहीं है। सैटेलाइट बस अड्डे के लिए भी परिवहन निगम के अधिकारी निशुल्क जमीन लेने पर अड़े रहे। ऐसे में उस जमीन का भू-उपयोग ही बदलना पड़ा।
घुट रहा है लोगों का दम
दिल्ली रोड स्थित भैसाली बस अड्डे से अनुबंधित बसों का भैसाली डिपो और निगम की बसों का मेरठ डिपो संचालित होता है। इसके अलावा गढ़ रोड स्थित सोहराबगेट बस अड्डे से सोहराबगेट डिपो और एमसीटीएसएल की बसें संचालित होती हैं। कभी शहर से बाहर रहे दोनों बस अड्डे अब एकदम बीच में आ गए हैं। यहां से संचालित होने वाली करीब 650 बसें शहर को न सिर्फ जाम करती हैं, बल्कि इनके डीजल का प्रदूषण भी लोगों का दम घोट रहा है।
जमीन है पर शिफ्टिंग का इरादा नहीं
ऐसा नहीं है कि बस अड्डों के लिए जमीन नहीं है। वर्ष-2006 में बने मास्टर प्लान 2021 में भी दोनों बस अड्डों को शहर से बाहर करने की योजना है। इसमें आधा दर्जन बस अड्डों के लिए जमीन चिह्नित की गई है। इसमें रुड़की रोड पर करीब 31.50 एकड़, दिल्ली बाईपास पर करीब 34 एकड़, संजय वन के पास करीब 6.06 एकड़, हापुड़ रोड पर करीब 25.26 एकड़, गढ़ मुक्तेश्वर रोड पर करीब 28.67 एकड़, मवाना रोड पर करीब 46 एकड़ और किला परीक्षितगढ़ रोड पर 46.47 एकड़ भूमि प्रस्तावित है। इसके अलावा महानगर बस सेवा के लिए लोहिया नगर योजना पाकेट ई के तलपट मानचित्र में 20240 वर्गमीटर भूमि आवंटित है। इतनी जमीन होने के बाद भी बस अड्डों को शिफ्ट नहीं किया जा रहा है। इसे लेकर रोडवेज और जिला प्रशासन एक-दूसरे के पाले में गेंद डालते रहते हैं।
भवन के लिए करीब पांच करोड़ का प्रस्ताव
भैसाली बस अड्डे की बिल्डिंग जर्जर होने पर तोड़ दी गई है। आरएम ऑफिस की बिल्डिंग को भी गिराया जाना है। नई बिल्डिंग बनाने के लिए करीब पांच करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार किया गया है। शासन की मंजूरी के बाद ही प्रस्ताव पर अमल होने की बात कही जा रही है।
आंकड़ों में बस अड्डे
भैसाली अड्डा
- 1934 में कैंट बोर्ड ने प्रदेश सरकार को दी जमीन
- 11671 वर्गमीटर है भैसाली अड्डे का क्षेत्रफल
- 1952 से जमीन पर यूपी रोडवेज काबिज
- 13430 वर्गमीटर है मेरठ कार्यशाला का क्षेत्रफल
- 60 हजार प्रतिदिन का औसत है यात्रियों का
सोहराबगेट
- 1978 में हुई सोहराबगेट डिपो की स्थापना
- 4954 वर्गमीटर क्षेत्रफल में है सोहराबगेट
- 12733 वर्गमीटर है कार्यशाला का क्षेत्रफल
- 12 हजार प्रतिदिन का औसत है यात्रियों का