गरीबों के इलाज के लिए लखनऊ को छह करोड़, मेरठ को बस 20 लाख
- मेरठ से धोखा
- 13 मेडिकल कॉलेजों को स्वीकृत किए गए 12 करोड़ रुपये
- शासन ने गरीबों के असाध्य रोगों के इलाज के लिए मेरठ में स्वीकृत किए मात्र बीस लाख
अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। गरीबों के असाध्य रोगों के इलाज के लिए मेरठ से धोखा हुआ है। पिछली बार की अपेक्षा इस बार गरीबों के असाध्य रोगों के इलाज के लिए मेरठ मेडिकल में साठ फीसदी बजट कम करते हुए मात्र बीस लाख रुपये स्वीकृत हुए हैं। वित्तीय वर्ष 2017-18 में अनुदान के अंतर्गत असाध्य रोगों के निशुल्क उपचार केलिए प्रदेश 13 मेडिकल कॉलेजों को 12 करोड़ आठ लाख 33 हजार रुपये स्वीकृत किए गए हैं। लखनऊ के तीन संस्थानों के लिए स्वीकृत की गई रकम छह करोड़ पांच लाख है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिस मेडिकल कॉलेज में असाध्य रोगों से पीड़ित कई जिलों के मरीज आते हों, वहां इतनी रकम में क्या होगा। पहले इसके लिए 50 लाख रुपये आए थे।
लखनऊ के किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय को तीन करोड़ रुपये, एसजीपीजीआई लखनऊ को एक करोड़ रुपये, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान लखनऊ को दो करोड़ पांच लाख रुपये स्वीकृत किए गए हैं। उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान सैफई इटावा के लिए एक करोड़ रुपये, हृदय रोग संस्थान कानपुर के लिए दो करोड़ रुपये, राजकीय मेडिकल कॉलेज गोरखपुर के लिए एक करोड़ तीन लाख रुपये, राजकीय मेडिकल कॉलेज झांसी केलिए 60 लाख और जेके कैंसर संस्थान कानपुर के लिए 30 लाख रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इनके अलावा मेडिकल कॉलेज मेरठ, सुपर स्पेशियलिटी बाल चिकित्सालय एवं स्नातकोत्तर शिक्षण संस्थान नोएडा, राजकीय मेडिकल कॉलेज इलाहाबाद, राजकीय मेडिकल कॉलेज कानपुर और राजकीय मेडिकल कॉलेज आगरा के लिए 20-20 लाख रुपये स्वीकृत किये गये हैं।
इस संबंध में मेडिकल कॉलेज केप्रमुख अधीक्षक (एसआईसी) डॉ. अजीत चौधरी ने बताया कि निर्देश हैं कि यह धनराशि बैंक, डाकघर में नहीं रखी जाएगी, बल्कि इसका इस्तेमाल आवश्यकता के अनुसार किया जाएगा। यानि असाध्य रोग से ग्रसित मरीज के भर्ती होने के बाद उसकी जरूरत के हिसाब से इस पैसे में खर्चा किया जाएगा। पहले असाध्य रोगों का बजट भी बाकी बजट के साथ ही आता था। अब इसे अलग किया गया है।
---
मेडिकल कॉलेज में ढाई से तीन हजार रहती है ओपीडी
मेडिकल कॉलेज में हर रोज अमूमन ढाई से तीन हजार मरीज ओपीडी में आते हैं। यह संख्या महीने में एक लाख के आसपास पहुंच जाती है, जबकि सालभर में 10 से 11 लाख। इनमें से असाध्य रोगों से पीड़ित 350 से ज्यादा मरीजों का इलाज हर साल यहां होता है।
पांच डॉक्टरों की कमेटी करती है तय
असाध्य रोगों में लीवर, हृदय रोग, किडनी रोग और कैंसर आदि रोग आते हैं। मरीज में ये रोग असाध्य स्थिति में हैं या नहीं, यह पांच डॉक्टरों की कमेटी तय करती है। इनके इलाज के लिहाज से यह रकम काफी कम मानी जा रही है, क्योंकि इन मरीजों का लगातार और लंबा इलाज चलता है।
गरीबों को साबित करनी होगी अपनी गरीबी
जो मरीज बीपीएल कार्ड धारक हैं, जिनकी वार्षिक आमदनी 35 हजार से कम है या जो सवा तीन एकड़ से कम जमीन के मालिक हैं। ऐसे मरीजों का निशुल्क इलाज किया जाता है। ऐसे में उनके पास इलाज के दौरान पूरे कागज होने जरूरी हैं। मेडिकल कालेज में गरीबी की पुष्ठि होने के बाद ही इलाज शुूरू होगा।