चार जुलाई को भगवान विष्णु चार माह के लिए अपने अध्यात्मिक वास में चले जाएंगे। जगपालक के प्रस्थान की तिथि आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की एकादशी कहलाती है। इसमें भगवान विष्णु आध्यात्मिक जगत के क्षीर सागर में विराजे शेष नाग की शैय्या पर योग निद्रा में चले जाते हैं।
ज्योतिष वैज्ञानिक भारत ज्ञान भूषण ने बताया कि चतुर्मास में पृथ्वी का सारा कार्यभार भगवान शिव पर आ जाता है। चतुर्मास में सतोगुणी व रजोगुणी दिव्य शक्तियों के आध्यात्मिक जगत में प्रस्थान कर जाने के कारण पृथ्वी पर भगवान शंकर की तमोगुणी संहारक शक्ति ही रह जाती है। इसलिए हम सब मनुष्यों को संकल्प लेना चाहिए कि इन चार माह में ऐसा कोई कार्य न करे, जिससे भगवान शिव की तमोगुणी संहारक शक्ति उग्र हो।
चतुर्मास में नकारात्मक प्रभावों से तथा तमोगुणी कार्यों से बचना होता है। इसलिए इन चार माह में सतोगुणी जप, पूजन, ध्यान, साधना, दान, पुण्य, हवन अवश्य करने चाहिए। प्रत्येक त्योहार को दिव्यता पूर्ण उत्साह पूर्वक मनाना चाहिए। साथ ही भगवान शिव का जलाभिषेक करें।
ये है विशेष देवशयनी एकादशी
सभी शुभ कार्य के लिए स्वयं सिद्धि अबूझ मुहूर्त के रूप में महत्वपूर्ण एकादशियों में आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष एकादशी होती है।
यह दिन विशेष रूप से संकल्प लेने और जगत में दिव्यता बढ़ाने का है।
देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु का चतुर्भुजी रूप शेष नाग की शैय्या पर विराजे, उनकी नाभि कमल में विराजे ब्रह्माजी एवं भगवान विष्णु के चरणों पर सेवारत लक्ष्मी जी के चित्र का ध्यान करें। यदि इस प्रकार का चित्र मौजूद हो तो क्रमश: पीले, सफेद, लाल सुगंधित फूलों से सुसज्जित करना चाहिए। इस तिथि पर एकादशी व्रत का पालन करना अति उत्तम रहता है।
एकादशी पर चावल यानी भात का प्रयोग निषेध होता है।
बहुत दिनों से अटका कोई भी कार्य या लंबित योजना का शुभारंभ किया जा सकता है।
भगवान विष्णु स्वयं सतोगुणी हैं, इसलिए तमोगुणी प्याज, लहसुन का प्रयोग पूर्णत: वर्जित है। मांसाहार तो किसी को भी कभी नही करना चाहिए।
पूरे दिन ध्यान जप, कीर्तन, एवं रात्रि जागरण विशेष फलदायी होता है।
दुग्ध एवं फलों का भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करना वरदायी होता है।
इस बार देवशयनी एकादशी मंगलवार की है, इसलिए शिव पूजन भी विशेष शुभ फलदायी है।