बॉर्डर पर पहरा देने वाली डोल्मा, कर रही मेरठियों की हिफाजत
मेरठ। कभी बॉर्डर पर आतंकियों को पकड़वाने तो कभी हाड़ कंपा देने वाली ठंड में जवानों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले भारतीय सेना के कितने ही साइलेंट वॉरियर्स अब रिटायर होने के बाद अपने मेरठियों की हिफाजत कर रहे हैं। सेना ने कुछ महीने पहले रिटायर डॉग्स को गोद देने के लिए लोगों से आवेदन मांगे थे। कागजी प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब इन्हें इनके नए मालिकों को सौंपना शुरू कर दिया गया है।
जम्मू में कई बड़े ऑपरेशन में अहम भूमिका निभाने वाली नौ साल की डोल्मा अब आयुष के परिवार की मेंबर बन चुकी है। आयुष बताते हैं कि डोल्मा इतनी अनुशासित है कि हर कोई उसको देखकर हैरान रह जाता है। अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषा को समझने वाली जर्मन शेफर्ड डोल्मा बच्चों के साथ बेहद प्यार से रहती है। रात को जब उसे लगता है कि इस वक्त आहट नहीं होनी चाहिए तो वो चौकन्नी हो जाती है। राघव को भी जब से शैंकी मिली है तबसे बेहद खुश हैं। लेब्राडोर शैंकी कई सैन्य अभियान का हिस्सा रही। इनके अलावा दूसरे तमाम डॉग्स को पाकर मेरठ के लोग बेहद खुश हैं। वे बताते हैं कि डॉग्स देने से पहले सेना के जवानों ने उनकी डाइट आदि के बारे में जानकारी दी। जब उनकी मौत हो जाए तो उसके बारे में भी जानकारी देने के लिए कहा गया।
ये है डाइट प्लान
दिन में तीन समय एक-एक कटोरी चावल, रोटी, एक गिलास दूध। सप्ताह में तीन दिन नॉनवेज। सुबह और शाम घुमाना होता है। मेडिकल चेकअप कराते रहना चाहिए।
सेना से रिटायरमेंट का मतलब था मौत
सेना के डॉग्स को रिटायरमेंट के बाद मारे जाने का चलन अंग्रेजों के शासन काल से था। जब कोई डॉग एक महीने से अधिक समय तक बीमार रहता था या ड्यूटी नहीं कर पाता तो उसे मार दिया जाता था। डॉग्स को मारे जाने के पीछे तर्क ये था कि उन्हें सेना के बेस लोकेशन्स और कैंप की जानकारी रहती है। ऐसे में कहीं वे सुरक्षा के लिए खतरा न बन जाएं। केंद्र सरकार ने इसको लेकर एक समिति बनाई थी। जिसके बाद सेना ने अपने आठ साल से ज्यादा उम्र के रिटायर्ड डॉग्स को गोद देने की पहल शुरू की थी।
देशी कुत्तों को भी दिया जा रहा प्रशिक्षण
मेरठ छावनी में स्थित रिमाउंट वेटनरी कॉर्प्स के ट्रेंड डॉग्स चीते जैसी फुर्ती रखते हैं। आरवीसी में जहां पहले जर्मन शेफर्ड, लेब्राडोर जैसी नस्लों को ट्रेंड किया जाता था वहीं, अब भारतीय नस्ल के देशी कुत्तों को भी प्रशिक्षित किया जा रहा है। छह महीने से नौ महीने की उम्र के डॉग्स को कठोर ट्रेनिंग दी जाती है। स्पेशल ट्रेनिंग के बाद उनका पूरा टेस्ट होता है। सेना के ट्रेंड डॉग्स तीस फीट बर्फ में दबे सेना के जवानों को खोजने की क्षमता रखते हैं। सीमा पर घुसपैठियों को पकड़ने से लेकर माइन डिटेक्शन और आतंकी गतिविधियों को रोकने में वे बार्डर पर अहम भूमिका निभा रहे हैं।