मेरठ। देशसेवा में सदैव तत्पर सेना की रिमाउंट एंड वेटनरी कॉर्प्स (आरवीसी) आज अपना 239वां स्थापना दिवस समारोह मनाएगी। मेरठ में आरवीसी के प्रमुख केंद्र पर बृहस्पतिवार को विशाल समारोह का आयोजन होगा। यहां आरवीसी के इतिहास, शौर्य गाथाओं क ो स्मरण करते हुए तमाम आयोजन होंगे। डीजी आरवीसी परेड की सलामी लेंगे, श्वान व अश्व करतब दिखाएंगे। 1779 को अस्तित्व में आए सेना के इस प्रमुख अंग का हर कदम सदैव देशसेवा और देश रक्षा के लिए तत्पर रहा है।
पूर्व सैनिक, वीर नारियां भी होंगे शामिल
कार्यक्रम सुबह साढ़े आठ बजे से शुरू होकर दिनभर चलेंगे। कोर डे और रि यूनियन सेरेमनी में पूर्व सैनिक अपने परिवार के साथ शिरकत करेंगे। वीर नारियों व सैनिकों को सम्मानित किया जाएगा। साथ ही साहसी कार्यों के लिए अश्वों और श्वानों को भी सम्मानित किया जाएगा। आरवीसी स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देंगे।
गौरवमयी गाथाओं से सजा है आरवीसी का इतिहास
रिमाउंट वेटनरी कोर सेंटर एंड कॉलेज के इतिहास में स्वर्णिम गाथाएं दर्ज हैं। जो आरवीसी के साहसिक कार्यों की गवाह हैं। 1779 में आरवीसी अस्तित्व में आई। ब्रितानी हुकूमत के उस दौर में घोड़ों का विभाग कलकत्ता में गठित हुआ। आर्मी रिमाउंट विभाग का गठन 1875 में सहारनपुर में हुआ। 14 दिसंबर 1920 को आर्मी वेटनरी और फार्म कोर का गठन हुआ। 1950 में रिमाउंट वेटनरी और फार्म कोर गठित हुई। मई 1960 को आरवीसी व मिलिट्री फार्म दो अलग सेक्शन बने। आरवीसी का 1929 में पूना से अंबाला शिफ्ट कर दिया गया। अंबाला से ये केंद्र सबाथू में 1947 तक रहा। 17 अप्रैल 1948 को गिलिस्पी लाइन मेरठ में शिफ्ट हुआ जो ब्रिटिश इंफेंट्री लाइन के नाम जाना जाता था। मार्च 1960 को यहां श्वान प्रशिक्षण फैकल्टी की स्थापना कैप्टन केसी उथ्रुप ने की। आरवीसी सेंटर एंड कॉलेज सेना के लिए अश्वों व श्वानों के प्रशिक्षण, नई ब्रीड तैयार करने का कार्य करता है। अब इसका एक अलग अंग सेंट्रल मिलेट्री वेटनरी लैब भी है।