फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

फैंसी बुर्के से बेहतर है पर्दा ही खत्म हो जाए

विज्ञापन
विज्ञापन
सभी केंद्रों के ध्यानार्थ
विज्ञापन

- दारुल उलूम के फैंसी बुर्के पर मुस्लिम महिलाओं की राय
अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। दारुल उलूम ने मुस्लिम महिलाओं को फैंसी बुर्का न पहनने की राय दी है। दारुल उलूम ने जारी फतवे में कहा है कि बुर्का फैंसी या चुस्त होने के बजाय ढीला और साधारण होना चाहिए। दारुल उलूम की इस राय पर मुस्लिम महिलाएं कहती हैं कि इससे तो बेहतर है कि बुर्का पहनना ही बंद कर दिया जाए। फतवे के बारे में महिलाओं का कहना है कि इस तरह के नियम कायदों का कोई मतलब नहीं है। कुछ महिलाओं की राय ये भी है कि बुर्का शरीर ढकने का एक पर्दा है। फैंसी बुर्का पहनने से तो अच्छा होगा कि पर्दा ही खत्म हो जाए।
गुमराह किया जा रहा
सेवानिवृत्त प्राचार्य और समाजसेवी नायब जेहरा जैदी कहती हैं कि लोगों को इस तरह के नियमों में उलझाकर उन्हें गुमराह किया जा रहा है। फैंसी बुर्का न पहनें, यह बिल्कुल गलत है। इस्लाम में साफ है कि महिलाओं का शरीर ढका रहे ऐसे कपड़े पहनें। लेकिन वो सजावटी न हों इस तरह का कोई नियम नहीं है। इसलिए इस तरह के नियम कायदों का कोई मतलब नहीं है।
विज्ञापन

बेसिक कांसेप्ट ही खत्म
पर्सनैलिटी एक्सपर्ट मदिहा शाह रसूल का कहना है कि बुर्का इसलिए पहना जाता है ताकि शरीर का आकार ढका रहे। महिला किसी के आकर्षण का केंद्र न बन पाए। लेकिन फैंसी बुर्क ा पहनने से बुर्के का बेसिक कांसेप्ट खत्म हो रहा है, इसलिए अच्छा है कि ऐसा बुर्का पहनने के बजाय बुर्का पहने ही नहीं।
ऐसा आदेश उचित नहीं
वर्ल्ड मुस्लिमा कांटेस्ट की रनरअप नाजरीन का मानना है कि हर इंसान को अपनी इच्छानुसार कपड़े पहनने का अधिकार है। अगर नियमों की बात करें तो बुर्का साधारण होना चाहिए। लेकिन हर व्यक्ति अपने मन के अनुसार कपड़े पहन सकता है इसलिए इस तरह का आदेश उचित नहीं हैं।
सुन्नत है फर्ज नहीं
मेडिकल कॉलेज के रेडियोलॉजी विभाग में एचओडी डॉ. यास्मीन उस्मानी की राय है कि बुर्का पहनना सुन्नत है फर्ज नहीं। चाहें तो पहन भी सकते हैं, नहीं भी पहन सकते। इस्लाम में इसकी अनिवार्यता नहीं है। लेकिन अगर बुर्का पहन ही रहे हैं तो उसमें शाइनिंग या फैंसीनेंस का होना जरूरी नहीं है। इससे बेहतर है कि बुर्का पहने ही नहीं।
विज्ञापन

इससे कोई फर्क नहीं
समाजसेवी जैनब अली के अनुसार समाज में हर व्यक्ति और महिला को मन मुताबिक कपड़े पहनने का हक है। वर्तमान दौर में जब महिलाओं की शिक्षा, उनके सशक्तिकरण पर बात होनी चाहिए, तब हम पहनावे और शौक पर पाबंदियां लगाने में जुटे हैं, जो एकदम गलत है। बुर्का फैंसी हो या साधारण इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें