छात्र पहुंचे विदेश, ट्रांसक्रिप्ट की व्यवस्था नहीं पार कर सकी सड़क
सीसीएसयू में विदेश जाने वाले छात्र-छात्राओं के डॉक्यूमेंट बनवाने की व्यवस्था खराब
छात्रों को बाहर साइबर कैफे पर टाइप करानी पड़ती है ट्रांसक्रिप्ट, विवि में होता है सत्यापन
मेरठ। समय के साथ बेहतरी के लिए व्यवस्था में बदलाव होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। सीसीएसयू में विदेश जाने वाले छात्र-छात्राओं को ट्रांसक्रिप्ट जारी करनी की व्यवस्था बदलाव की मांग कर रही है। व्यवस्था अच्छी हो तो बात समझ में आती है, लेकिन यहां तो खराब व्यवस्था लगातार चलायमान है। छात्र पढ़ लिखकर विदेश पहुंच गए लेकिन ट्रांसक्रिप्ट की व्यवस्था विवि के सामने की सड़क पार नहीं कर सकी। विवि में विदेशी डॉक्यमेंट बनाने का ट्रीटमेंट अच्छा नहीं है।
पढ़ाई, रिसर्च और नौकरी के लिए विदेश जाने वाले छात्र-छात्राओं को ट्रांसक्रिप्ट की आवश्यकता पड़ती है। ट्रांसक्रिप्ट को एक तरह से मार्कशीट कहा जाता है। यह विवि द्वारा जारी किया गया ऐसा डॉक्टयमेंट जो विदेश में उसकी एकेडमिक क्वालिफिकेशन बताता है। ट्रांसक्रिप्ट सर्टिफिकेट पर छात्र ने जो भी डिग्री की है, उसके सभी साल के अंकों का ब्योरा होता है। नाम, पिता का नाम, रोल नंबर, एनरोलमेंट नंबर, प्राप्तांक, पूर्णांक, डिविजन, रिजल्ट आदि की जानकारी दी गई थी। विवि अपने लेटर पेड पर यह सर्टिफिकेट जारी करता है। गौरतलब बात यह है कि छात्र का रिकॉर्ड तो विवि में है, लेकिन ट्रांसक्रिप्ट बाहर साइबर कैफे पर टाइप होती है। ट्रांसक्रिप्ट के लिए आवेदन करने वाले छात्र-छात्राओं से कहा जाता है कि पहले वह विवि के बाहर सड़क के पार साइबर कैफे पर तय फारमेट में अपने नंबर दर्ज करा लाएं। गोपनीय विभाग नंबरों का सत्यापन करता है। चेक करने के बाद छात्र को विवि के नाम का लेटर पैड दिया जाता है। उस पर दोबारा जाकर साइबर कैफे से नंबर टाइप कराकर संबंधित अधिकारी के साइन होते हैं। टाइपिंग का काम अगर विवि में ही हो तो छात्र को कई चक्कर न लगाने पड़े और डॉक्यमेंट की गोपनीयता भी कायम रहे। विवि में कर्मचारी टाइपिंग करने से बचते हैं, इसलिए ट्रांसक्रिप्ट टाइपिंग का काम बाहर हो रहा है।
अमेरिका से लेकर आस्ट्रेलिया तक छात्र
दुनिया के कई देशों में सीसीएसयू के छात्र नौकरी और पढ़ाई कर रहे हैं। इनमें मुख्य रूप से आस्ट्रेलिया, कनाड़ा, रूस, अमेरिका, इंग्लैंड, सिंगापुर, साउथ कोरिया, जापान आदि देश शामिल हैं। आईआईटी से पीएचडी करने के बाद रिसर्च के लिए भी विदेश में हैं। महीने में ट्रांसक्रिप्ट बनवाने के औसतन केस 15 आ जाते हैं।
वर्जन....
ट्रांसक्रिप्ट बनाने की प्रक्रिया को सुधारा जाएगा। टाइपिंग का काम अंदर ही कराने की व्यवस्था बनाई जाएगी। यह महत्वपूर्ण डॉक्यूमेंट है। इस काम को सिंगल विंडो से कराने का काम किया जाएगा। दीप चंद्र, रजिस्ट्रार, सीसीएसयू