शबे कद्र की रात फरिश्ते जमीन पर आते हैं
फलावदा। माह रमजान की आखिरी पांच रातें जिन्हें अरबी में ताक या शबे कद्र की रात भी कहा गया है। पूरे रमजान में 21, 23, 25, 27, 29 वें रोजे की रातें होती हैं। रमजान में जहां इबादत करने के बदले 70 गुना ज्यादा नेकी मिलती है। वहीं, शबे कद्र की रातों में इबादत करने से हजारों रातों की इबादत का सवाब मिलता है।
कुराने पाक में इस बात का जिक्र किया गया कि रमजान की इन ताक रातों में से कोई भी एक रात शबे कद्र की रात होती है। जिसे गुप्त रखा गया है। हुजूर ने फरमाया कि बिना इस बात का फिक्र किए शबे कद्र की रात कौन सी है। बंदों को खुदा की इबादत करनी चाहिए। कुरान शरीफ में जिक्र किया गया है कि शबे कद्र की रात अल्लाह के हुक्म पर फरिश्ते अल्लाह की इबादत करने वाले बंदों को देखने के लिए जमीन पर आते हैं। इनकी इबादत की पल-पल की खबर खुदा को देते रहते हैं। फरिश्तों का जमीन पर आना और खुदा के पास जाकर इबादत करने वालों की जानकारी देने जाने का ये सिलसिला सुबह की अजान तक चलता रहता है। फरिश्ते खुदा से बताते हैं कि कौन बंदा तुझसे अपने गुनाहों की माफी चाहता है और कौन बंदा मगफिरत चाहता है। यह सुनकर अल्लाह अपने बंदों के सारे गुनाह को माफ कर देता है। कुरान में यह भी जिक्र किया गया है कि शबे कद्र की रात को अल्लाह खुद अपने बंदों को पुकारता है। है कोई जो अपने गुनाहों की माफी चाहता है। कोई जो तकलीफों से निजात चाहता है। इस रात में बंदा अपने खुदा से जो कुछ भी मांगता है उसकी दुआ कुबूल की जाती है। कुछ लोग मानते हैं कि शायद 27 रोजे को शबे कद्र की रात होती है। शबे कद्र की रात 21, 23, 25, 27, 29 वीं रातों में से कोई भी एक रात हो सकती है। इस रात को बंदों से गुप्त रखा गया है। इस एक रात इबादत करने का सवाब हजारों रातों की इबादत से ज्यादा बताया है। रमजान के महीने में बड़ों के साथ साथ बच्चे भी इबादत करने से पीछे नहीं रहते हैं। वे भी बढ़-चढ़कर इबादत करते हैं।