- सामूहिक हत्याकांड की याद आते ही आज भी कांप उठता है दिल
अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। हाशिमपुरा की 33वीं बरसी पर बुधवार को इस घटना में मारे गए 42 लोगों की याद में शोकाकुल परिवारों द्वारा कुरानख्वानी की गई। उन्होंने मगफिरत भी की। रमजान माह में 22 मई 1987 की रात हुए इस सामूहिक हत्याकांड को आज भी याद करते ही दिल कांप उठता है।
पीड़ित परिवार बताते हैं कि आज इस कांड को 32 साल हो गए। 22 मई 1987 जुमा अलविदा के दिन सर्च के दौरान गुलमर्ग सिनेमा के सामने हाशिमपुरा से 48 लोगों को सुरक्षाकर्मियों ने उठाया और पुलिस लाइन ले गए। यहां से उसी रात सभी को ट्रक में मुरादनगर की गंगनहर किनारे ले जाकर पीएसी के जवानों ने गोलियां मार दी थी। इनमें हाशिमपुरा के 42 लोग मारे गए और पांच लोग किसी तरह नहर किनारे झाड़ियों के सहारे बच गए। इनके नाम हैं जुल्फिकार नासिर, मो. नईम, बाबुद्दीन, मुजीबुर्रहमान एवं मो. उस्मान। पीड़ित जमालुद्दीन ने बताया कि इस घटना में मारे गए उनके बेटे कमरुद्दीन को याद कर उनकी आंखें नम हो जाती है। हाशिमपुरा इंसाफ कमेटी के अध्यक्ष जुल्फिकार नासिर इस घटना के दौरान बच गए थे। उन्होंने बताया कि गोली उनकी बगल से निकल गई थी उन्होंने किसी तरह जान बचाई। उनका कहना है कि इस घटना में हाशिमपुरा के कमरुद्दीन, सिराज, अशरफ, यासीन, हाजी शमीम, इकबाल उर्फ बालो, अब्दुल कदीर, शमशाद, सदरुद्दीन, जमशेद, हनीफ, उस्मान आदि 42 लोग मारे गए थे। जुल्फिकार नासिर ने बताया कि पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट ने इस घटना के 16 आरोपी पीएसी जवानों को उम्रकैद की सजा सुनाई। उनका कहना है कि इससे भी कड़ी सजा उन्हें मिलनी चाहिए। फिलहाल यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
अगले दिन मलियाना में भी हुई घटना
हाशिमपुरा कांड के अगले दिन 23 मई 1987 को मलियाना की मुस्लिम बस्ती में दंगाइयों ने हमला कर दिया। सूत्रों के अनुसार इस घटना में 91 लोगों को घटना का आरोपी बनाया गया। मलियाना के पीड़ित परिवारों को 32 वर्ष बाद भी अभी तक इंसाफ नहीं मिला है।