हस्तिनापुर। पर्यूषण महापर्व के पावन अवसर पर श्री दिगम्बर जैन प्राचीन बड़ा मन्दिर हस्तिनापुर में चल रहे समवशरण महामंडल विधान में धर्म की गंगा निरंतर प्रवाहित हो रही है। इस धर्मामयी गंगा में संयम, तप, त्याग आदि के माध्यम से भक्तजनों द्वारा किए अपराधों की क्षमा याचना की जाती है।
दस दिवसीय इस महोत्सव में कार्यक्रम का शुभारंभ नित्य प्रतिदिन की भांति ओमकार के मंत्रोच्चार पूर्वक हुआ। बृहस्पतिवार को शांतिधारा करने का सौभाग्य मोतीलाल जैन, शीतल, सुरेश, धर्मचंद, विनोद जैन को प्राप्त हुआ। शांतिधारा में सहयोग अजय किशोर जैन को प्राप्त हुआ। नित्य नियम पूजन के पश्चात श्री शांतिनाथ, श्रीमल्लिनाथ सोलह कारण पूजन एवं दशलक्षण पूजा की गई। समवशरण महामण्डल विधान में 24 तीर्थंकर अरहंतों की पूजन अर्चना करते हुए विधान के मांडले पर पूर्ण भक्ति के साथ इंद्रों ने अर्घ्य समर्पित किये। आज पर्यूषण पर्व के सातवें दिन पूज्य मुनि श्री 108 भावभूषण जी महाराज ने तप धर्म पर प्रवचन देते हुए कहा कि तप के माध्यम से कर्मों की निर्जरा होती है। तप से ही आत्म विशुद्धि जागृति होती है। सोने को भी सोलह ताप दे करके शुद्ध किया जाता है उसी प्रकार से हमारे अंदर भी क्रोध, मान, माया, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष एवं अष्ट कर्म रूपी कर्म किट्टकाएं जमी हुई हैं। इन कर्म किट्टकाओं को तप रूपी शोधन द्वारा हटाया जा सकता है। इस तप की महिमा अपरंपार है। इस तप को देवता भी तरसते हैं। देवता भी तप के लिए नमस्कार कर अपना सौभाग्य मानते हैं। साक्षात तीर्थंकर भी क्यों न हो तप के द्वारा ही उनके कर्मों का क्षय होता है। अत: तप धारण आवश्यक है। इसलिए तप करते हुए कर्मों का नाश करो। सायंकालीन बेला में क्षेत्र के उपाध्यक्ष जीवेंद्र जैन ने कहा तप करने से कर्मों की निर्जरा होती है। इच्छाओं को रोकना तप कहलाता है। तप के बारह भेद बताए हैं। ये संसार के दु:खों से बचाकर इस जीव को उत्तम सुख प्राप्त कराते हैं। आचार का पालन करते हुए धर्म का सही निर्वहन किया जा सकता है। जैन धर्म एक महान प्राचीन धर्म है। मनुष्य योनि में जन्म लेने के बाद जैन कुल मिलना अपार सौभाग्य की बात है। अत: हमें तप करना चाहिए। कार्यक्रम में उपस्थित क्षेत्र के अध्यक्ष अनिल जैन, महामंत्री मुकेश जैन, कोषाध्यक्ष सुनील कुमार, मंत्री राजेन्द्र कुमार, राजेन्द्र जैन, विजय कुमार, मुकेश जैन, अशोक जैन, उमेश, कमल जैन, अतुल जैन, मणिचन्द आदि का सहयोग रहा।
मुनियों के लिए तप सबसे प्रिय
हस्तिनापुर। जम्बूद्वीप में चल रहे दशलक्षण पर्व के अवसार पर आज तपधर्म के दिन विशेष रूप से तीनमूर्ति मंदिर में भगवंतों पंचामृत अभिषेक किया गया तथा तपधर्म की पूजन की गई। इस अवसर पर अनेक प्रांतों से पधारे यात्रियों ने शांतिविधान किया। विधान जम्बूद्वीप के समस्त जैन स्टाफ ने भी भाग लिया। संध्याकाल में सभी मंदिरों में भगवंतों की आरती की गई एवं प्रश्नमंच का आयोजन किया। इस अवसर पर पूज्य माताजी ने भी आशीर्वादन एवं तप धर्म के बारे में भक्तों को बताया कि संसार में कशाय तथा विषयरूपी योद्धा यद्यपि अत्यंत दुर्जय है। किंतु जिस मुनि के पास तपरूपी प्रबल सुभट मौजूद है। उसका वे कुछ भी नहीं कर सकते तथा वे मुनि उपद्रव रहित सुख से मोक्ष चले जाते हैं। इसलिए मोक्षाभिलाषी मुनियों को तप सबसे प्रिय समझना चाहिए। वह तप मूल में बाह्य-आभ्यन्तर के भेद से दो प्रकार का है और अनशनादि छह बाह्य प्रकार तथा प्रायश्चित, विनय आदि छह अभ्यन्तर रीति से बारह प्रकार का है। अनेक प्रकार के व्रतादि धारणकर तपश्चरण श्रावक भी करते हैं। श्री पूज्यपाद स्वामी कहते हैं कि जिससे जीव का उपकार होता है उससे शरीर का अपकार होता है। जिससे शरीर का उपकार होता है उससे जीव का अपकार होता है। श्री कुन्दकुन्द देव भी कहते हैं कि जो सुखिया जीवन में तत्व की भावना भाते हैं उनका ज्ञान दु:ख आने पर नष्ट हो जाता है अत: दु:ख को भुलाकर आत्म तत्व का अभ्यास करना चाहिए। तीर्थंकर को निर्वाण जाना निश्चित है, दीक्षा लेते ही मन:पर्यय ज्ञान हो जाता है फिर भी वे तप करते हैं, ऐसा जानकर तप करना चाहिए। वास्तव में जो शरीर से आत्मा को भिन्न समझते हैं वे अध्यात्म प्रेमी ही शरीर से नि:स्पृह होकर तप कर सकते हैं। शरीर से निर्मम होने के लिए तप का अभ्यास अतीव उपयोगी है। प्रमाद छोड़कर अभ्यास करने से सर्वकार्य सिद्ध हो जाते हैं अत: तपधर्म हमेशा ग्राह्य है।