अमर उजाला ब्यूरो
सरूरपुर। इस्लाम में रमजान की तरह मुहर्रम भी खुदा की इबादत के लिए बहुत खास माना जाता है। इस्लामी कलैंडर यानी हिजरी संवत में मुहर्रम के महीने से ही साल की शुरूआत होती है। मुस्लिम समुदाय के लोग इस महीने हजरत मुहम्मद सल. के नवासे इमाम हुसैन और उनके साथियों की इस्लाम को जिंदा रखने के लिए कुरबानी को याद किया जाता है।
जामिया दारूस सलाम पांचली बुजुर्ग के मोहतमिम मौलाना यूसुफ कासमी ने बताया कि रमजान के अतिरिक्त सबसे अहम रोजे मुहर्रम के हैं। इस मौके पर अल्लाह की इबादत और खासतौर से रोजे रखने चाहिए। खुद अल्लाह के पाक रसूल हजरत मोहम्म्द सल्ललाहु अलैही वसल्लम ने भी खुद इस महीने में रोजे रखे और अपने साथियों को भी इबादत करने की नसीहत दी। मुहर्रम की नौ और दस तारीख को इबादत करना बड़ा सवाब बताया है। हजरत इमाम हुसैन अपने उसूल और दीन की खातिर शहीद हुए थे। मुहर्रम का महीना इबादत की नजर से भी बहुत खास है। मुहर्रम के दौरान शहीद हुए 72 लोगों की शहादत को भी याद किया जाता है। मुहर्रम नेकी और कुर्बानी का पैगाम देता है। इस्लाम को मानने वाले विभिन्न समुदाय के लोग अलग-अलग तरीकों से इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं। कुछ समुदाय ताजियों के माध्यम से उन्हें याद करते हैं। इस दौरान एकत्र होकर कर्बला तक जुलूस निकालते हैं। वहीं, कुछ समुदाय रातभर जागकर नफ्ली नमाज पढ़कर अपने दिलों को उनकी याद करते हुए खुदा से दुआ मांगते हैं।