मोदीपुरम। बासमती की अच्छी और गुणवत्तायुक्त फसल लेने के लिए 11 पेस्टीसाइड से बचना होगा। इनका अधिक इस्तेमाल बासमती की फसल पर असर डाल रहा है। इससे विदेशों में निर्यात में भी समस्या आ रही है। वैज्ञानिक इन पेस्टीसाइड की पहचान कर किसानों को जानकारी दे रहे हैं।
किसान पेस्टीसाइड का अंधाधुंध इस्तेमाल कर बासमती की खेती को प्रभावित कर रहे हैं। पिछले कई सालों से यह समस्या आ रही है। इस कारण से विदेशों में भेजे जा रहे बासमती पर भी निर्यात में समस्या दिख रही है। अब से चार साल पहले बासमती पर अधिक पेस्टीसाइड का प्रयोग होने के कारण बासमती को जर्मनी ने वापस कर दिया था। इस बीच स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ था। अब फिर से पेस्टीसाइड का प्रयोग बढ़ रहा है। विदेश में जाने से पहले सैंपल भी लिए जाते है, यदि सैंपल में ज्यादा पेस्टीसाइड का इस्तेमाल मिलता है तो फिर बासमती निर्यात करने में भी दिक्कत आती है।
पेस्टीसाइड है बासमती के लिए खतरा
बासमती निर्यात विकास प्रतिष्ठान के प्रधान वैज्ञानिक, प्रभारी अधिकारी डॉ. रितेश शर्मा ने कहा कि 11 पेस्टीसाइड बासमती के लिए खतरा हैं। इसमें ऐसीफेट, बुपरो फ्रेजिन, कार्बेंडाजिम, क्लोथियानिडिन, हेग्जाकोना जोल, इमीडाक्लोरापिड, आईसोप्रोथलीन, प्रोजीकोना जॉल, टेबू कोना जोल, थायो मैथोकाम, ट्राइस्क्लाजॉल आदि के प्रयोग से यह समस्या पैदा हो रही है। यदि किसान वैज्ञानिकों की सलाह से पेस्टीसाइड का इस्तेमाल करेगा तो कोई परेशानी नहीं होगी।
वेस्ट यूपी के इन जिलों में होती है बासमती
मेरठ, आगरा, अलीगढ़, बदायूं, बागपत, बरेली, बिजनौर, बुलंदशहर, एटा, इटावा, फर्रुखाबाद, फिरोजाबाद, गौतमबुद्धनगर, गाजियाबाद, हाथरस, जेपी नगर, कन्नौज, मैनपुरी, मथुरा, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, औरेया, पीलीभीत, रामपुर, शाहजहांपुर, सहारनपुर, शामली, हापुड़, संभल आदि शामिल है।
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बासमती पर पेस्टीसाइड का प्रयोग अधिक दिख रहा है। पेस्टीसाइड का अधिक प्रयोग होगा तो उसका असर निर्यात पर भी दिखेगा। किसानों को इसके लिए जागरूक किया जा रहा है। -डॉ. रितेश शर्मा, प्रभारी एवं प्रधान वैज्ञानिक, बीईडीएफ