माछरा। रमजान माह के अवसर पर बृहस्पतिवार को नमाज पढ़ने के बाद मौलाना रईस मलिक सरावनी ने तकरीर करते हुए बताया कि अकीदतमंदों को रोजा ईमान के साथ रखना चाहिए तथा रोजे का मकसद इंसान के अन्दर तकवा एवं परहेजगारी पैदा करना है।
हापुड़-किठौर मार्ग पर मस्जिद के इमाम मौलाना रईस मलिक ने कहा कि सच्चे मुसलमान की हदीस है कि जिसने रमजान मुबारक का रोजा ईमान और एहतसाब के साथ रखा है। उस रोजेदार के पिछले सब गुनाह माफ कर दिए जाएंगे। इससे यह समझना जरूरी है कि रोजा ईमान के साथ रखना चाहिए अगर हम भूखे और प्यासे तो रहे मगर अल्लाह तआला पर ईमान हमारा पूरा नहीं तो रोजा हमारा रोजा नहीं। ईमान का मतलब एक अल्लाह को अपना रब मानना है और मरते दम तक उसी एक रब का हुक्म मानना है। जब हम खुदा के हुक्म से रोजा रखते हैं, पूरा दिन भूख-प्यास को सहते हैं नमाज अदा करते हैं और जकात अदा करते हैं। यह सब खुदा को राजी करने के लिए करते हैं। जब हम पूरे दिन के लिए खाना-पीना छोड़ सकते हैं तो हम उस रब के हुक्म से झूठ बोलना क्यों नहीं छोड़ सकते है। हराम रोज कमाना, अमानत में खयानत करना, किसी का दिल दुखाना, किसी की जान-माल को नुकसान पहुंचाना, अपने पड़ोसी को तकलीफ पहुंचाना क्यों नहीं छोड़ सकते हैं। मौलाना ने कहा कि अगर हमने अल्लाह तआला पर ईमान रखकर रोजा रखा, रोजे में हमने हिसाब किया। यदि अपने गिरेबान में झांककर देखा कि हमने कितने काम अपने रब की मर्जी के खिलाफ किए हैं और उस पर हमने अल्लाह तआला से माफी मांगी। आंइदा बुुराई नहीं करने से तौबा की तो हदीस में आता है कि अल्लाह तआला उस मोमिन रोजेदार के पिछले सब गुनाह माफ कर देंगे। हमें संकल्प लेना होगा कि हम अपने रब का हुक्म मानेंगे। हलाल रोजी से कमाए हुए रुपये से जो रिज्क मिलेगा, उससे ही रोजा इफ्तार करेंगे और कराएंगे। साथ ही आंख, कान, हाथ, पैर यानि पूरे शरीर का रोजा रखेंगे न कि सिर्फ भूखे-प्यासे रहेंगे।
मुख्य बातें
हापुड़-किठौर मार्ग स्थित मस्जिद के इमाम मौलाना रईस मलिक सरावनी ने की तकरीर
रोजेदारों को अल्लाह ताआला का हुक्म मानने का संकल्प लेना चाहिए