मेरठ। दलित आंदोलन के बाद स्थिति देखने में भले ही सामान्य नजर आ रही हो। लेकिन इस आंदोलन को लेकर उठी चिंगारी को शांत करने के लिए पुलिस और प्रशासन के अधिकारी रात दिन जूझ रहे हैं। स्थिति ये है कि दिन भर बैठकों और फ्लैग मार्च की मशक्कत के चलते कलक्ट्रेट सूना पड़ा हुआ है। जहां कभी धरना प्रदर्शन और शिकायकर्ताओं की भीड़ नजर आती थी, उसकी जगह अब पुलिस फोर्स नजर आ रही है। अधिकारी भी दिन भर बैठकों के दौरान 14 अप्रैल तक किसी तरह शांति कायम रहे, इसकी रणनीति बनाने में जुटे हैं।
दो अप्रैल को दलित आंदोलन में हुई हिंसा कहीं न कहीं पुलिस प्रशासन की भी लापरवाही का परिणाम है। क्योंकि पहले से घोषित इस आंदोलन को पुलिस-प्रशासन ने बहुत ही हल्के में लिया, जिसका नतीजा उन्हें झेलना भी पड़ा। लेकिन अब जो इनपुट मिल रहा है, उससे उनके होश उड़े हुए हैं। क्योंकि 14 अप्रैल को डॉ. भीमराव आंबेडकर जयंती या उससे पहले जातीय हिंसा भड़क सकती है। जिसे शांत करने के लिए पुलिस-प्रशासन दिन-रात मशक्कत कर रहा है।
इस कवायद में खुद जिलाधिकारी व एसएसपी तो लगे ही हैं, उनके साथ सभी अपर जिलाधिकारी, एसडीएम, सिटी मजिस्ट्रेट, एसीएम, तहसीलदार, नायब तहसीलदार आदि भी हैं। वहीं, शहर और देहात को कई सेक्टरों में बांटते हुए मजिस्ट्रेट भी प्रशासन ने तैनात किए हैं, जो थानावार भ्रमण करने के साथ जातियों के मुखियाओं से संवाद स्थापित कर रहे हैं। इन मजिस्ट्रेटों में विकास भवन, मंडी परिषद सहित अन्य विभागों के अधिकारी शामिल हैं। ऐसे में तमाम दफ्तरों में सिर्फ शांति कायम करने पर ही मंथन हो रहा है, जबकि फरियादी भी पूरे माहौल को देखते हुए अब कम ही नजर आ रहे हैं।
खास बातें:
- कलक्ट्रेट में अधिकतर अधिकारियों की ड्यूटी मजिस्ट्रेट में
- शांति समिति की बैठक, फ्लैग मार्च में उलझा पूरा सरकारी सिस्टम