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किठौर , शाहजहांपुर में हाथी की सिंगाड से सहमी सभी पार्टी जल

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किठौर।
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निकाय चुनाव में किठौर और शाहजहांपुर नगर पंचायत में बसपा के उम्मीदवारों के सिर जीत का सेहरा बंधा है। दोनों नगर पंचायत में जीत का गणित हिंदू मतों पर निर्भर रहा। हालांकि किठौर में रालोद के पूर्व विधायक के चलते बसपा का पलड़ा शुरू से ही भारी दिखाई दिया। वहीं, शाहजहांपुर में बसपा उम्मीदवार ने शुरू से आखिर तक बढ़त बनाए रखी।
किठौर के 15 वार्डों में कुल 20100 मतदाता हैं। निकाय चुनाव में 76 प्रतिशत मत पडे़ थे। चुनाव मैदान में बसपा से सांसद मुनकाद अली की पुत्रवधू निदा, सपा के पूर्व कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर के चचेरे भाई की पत्नी रक्षिंदा परवीन और पूर्व चेयरमैन की पत्नी रिहाना मतलूब मैदान में थीं। यहां सपा और बसपा के दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी। दोनों ने अपने-अपने प्रत्याशियों को जिताने के लिए एड़ी-चोटी के जोर लगाया। बसपा के सांसद ने किठौर निवासी रालोद के पूर्व विधाक परवेज हलीम की मदद से अपनी पुत्र वधू निदा को मैदान में उतारा था। पूर्व चेयरमैन मतलूब गौड़ ने कस्बे में कराए विकास के दम पर पत्नी को मैदान में उतारा था। हालांकि बसपा के गंठबंधन ने ज्यादा देर तक उनको नहीं टिकने दिया। सपा उम्मीदवार शुरू से ही तीसरे स्थान पर जाती नजर आईं। जिससे सपा खेमे में मायूसी छाई रही। भाजपा ने यहां कोई भी प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा था।
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हिंदू मतों ने दी बसपा को बढ़त
शाहजहांपुर में पहली बार नगर पंचायत चुनाव हुआ है। यहां पर 12379 में से कुल 7998 मत पडे़ थे। भाजपा, बसपा, सपा समेत 18 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। यहां पर बसपा उम्मीदवार राना बेगम को दलित, मुस्लिम वोट के अतिरिक्त वैश्य, प्रजापति, सैनी, वाल्मीकि, खटीक, कोहली के वोट मिले। जिस कारण शुरू से ही कोई उसका पीछा नहीं कर पाया। तमाम प्रयास के बाद भी भाजपा, सपा और निर्दलीय प्रत्याशी उनके सामने नहीं टिक पाए।

जनता ने निर्दलीयों पर जताया भरोसा
नगर पंचायत चुनाव में किठौर और शाहजहांपुर में सभासद पदों पर निर्दलीय प्रत्यशियों ने बाजी मारी। दोनों नगर पंचायत में एक-दो को छोड़ अन्य पार्टी के प्रत्याशी नहीं चुने गए। खास बात यह है कि किठौर में इस बार ज्यादातर नए सभासद चुने गए हैं।
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किठौर की राजनीति लखनऊ तक अहम रोल अदा करती है। यह बसपा और सपा के कद्दावर नेताओं की कर्मभूमि है। सपा यहां पर कई वर्षों से छाप छोडे़ हुई थी। जिसके चलते लगातार सपा से शाहिद मंजूर विधायक चुने जा रहे थे। भाजपा की आंधी ने उनकी साइकिल को रोक दिया। उन्हें भाजपा विधायक सत्यवीर त्यागी से हार का सामना करना पड़ा। वहीं, बसपा के मुनकाद अली राज्यसभा में सांसद चुने जाते रहे हैं। उन्होंने निकाय चुनाव में पहली बार अपनी पुत्रवधू निदा को उतारा और किठौर निवासी रालोद के पूर्व विधायक परवेज हलीम से समझौता कर लिया। बात दिग्गजों की साख की थी। इसलिए सपा के पूर्व कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर ने चचेरे भाई की पत्नी को जिताने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया। हालांकि वे बदली राजनीतिक परिस्थितियों में बेबस दिखे। उनके खेमे में शुक्रवार को सुबह से ही मायूसी नजर आई। हालांकि उनके परिवार ने हार का ठीकरा सपा उम्मीदवार के सिर फोड़ दिया है।

मुख्य बातें
पहली बार चुनाव मैदान में उतरे बसपा के सांसद की पुत्रवधू
अपने गढ़ में भी जादू नहीं चला पाए पूर्व कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर
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