बाल दिवस पर विशेष
अमर उजाला ब्यूरो
सरूरपुर।
यूं तो कहने को 14 नवंबर बाल दिवस अथवा बच्चों का दिन है। देश में प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन के रूप में मनाते हैं। बाल दिवस के दिन बच्चे स्कूल में जी भर के मौज मस्ती करते हैं और यह सोचकर खुश होते हैं कि आखिर हमारे लिए भी एक विशेष दिन है। मगर आधुनिकता की दौड़ में लोग बाल दिवस के सही मायनों को भूलते जा रहे हैं।
एक तरफ तो सरकार गरीब बच्चों के प्रति अनेक प्रोत्साहन कार्य कार्यक्रम चलाते हुए भरपूर धनराशि आवंटित कर रही है। वहीं, ऐसे में हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। बाल दिवस की पूर्व संध्या पर विकास खंड सरूरपुर क्षेत्र के गांव कस्बा खिवाई में सोमवार को सर्वशिक्षा अभियान की बानगी कुछ और ही बयां करती दिखी। जहां देश बाल दिवस को मनाने की तैयारी करते हुए स्वयं को गौरान्वित महसूस कर रहा है। वहीं ये मासूम बच्चे शायद अपने बचपन का मतलब नहीं जानते। क्योंकि न तो इन्हें स्कूल का पता है और नहीं अपने बचपन का। वहीं ये मासूम बच्चे अपने पेट की खातिर बचपन और ठंड को भूलकर चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी बीनते नजर आए। लगता है कि सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान को गांव तक नहीं पहुंचाया है। खिवाई, हर्रा के इन मासूम बच्चों ने बताया कि मां-बाप उन्हें हर रोज लकड़ी बीनने के लिए भेज देते हैं। जिससे घर का चूल्हा जलता है।
बाल दिवस मतलब बच्चों का दिन, जिसमें उन बच्चों के बारे मेें भी सोचा जाए जो ना तो शिक्षित है, न पेट भरने के लिए रोटी, और न ही तन ढकने के लिए कपड़े। मगर आधुनिकता की आंधी में बाल दिवस के सही मायने धूमिल होते जा रहे हैं। आज के समय में बाल दिवस मिठाई चॉकलेट बांटने और भाषणबाजियों तक ही सिमट गया है। पढ़ाई-लिखाई और खेलने कूदने की उम्र में ये बच्चे दो वक्त की रोटी की तलाश करते हैं। खानाबदोशों की तरह इधर-उधर भटकते फिरते हैं। यदि हमें बाल दिवस मनाना है तो सबसे पहले हमें गरीबी और अशिक्षा के गर्त में फंसे बच्चों को अपनी दुनिया में शामिल करना होगा। यदि हम सभी केवल एक गरीब अशिक्षित बच्चे की शिक्षित बनाने का बीड़ा उठाएंगे तो जल्द ही हमारा देश उन्नति के पथ पर अग्रसर होगा। ऐसा करके हम सही मायने में बाल दिवस मनाने का हक प्राप्त करेंगे।
समाज में जागरूकता न होने के कारण बच्चे पढ़ाई से दूर हो रहे हैं। साथ ही समाज के लोगों को स्वयं बच्चों के हितों के लिए आगे आना होगा। तभी देश के कर्णधारों को सही दिशा मिल सकेगी।-अजय शर्मा, सचिव सत्यकाम संस्था
बेसिक स्कूलों में खाना, यूनिफार्म, पुस्तक, नि:शुल्क दी जाती है। जबकि स्कूल चलो अभियान के तहत बच्चों और अभिभावकों को जागरूक भी किया जाता है। हालांकि फिर भी कुछ बच्चे यदि छूट रहे हैं तो वे पुन: प्रयास करेंगे।-उदित कुमार, खंड शिक्षा अधिकारी, सरूरपुर