अल्लाह के हुक्म की तामील करना फर्ज
हैसियत के अनुसार दी जाएगी कुर्बानी
अमर उजाला ब्यूरो
सरूरपुर।
ईद-उल-अजहा पर कुर्बानी करना अल्लाह का हुक्म और नबी इब्राहीम की सुन्नत को जिंदा करता हैं। जिसमें नबी इब्राहीम अलै ने अल्लाह ताआला के हुक्म की तामील करने के लिए अपने इकलौते अजीज बेटे को खुदा की राह में कुर्बान करने के लिए कोई भी परवाह नहीं की।
जामिया खैरूल मदारिस खिवाई के मोहतमिम मुफ्ती उस्मान ने बताया कि हदीस के अनुसार इस्लाम मजहब के आखिरी पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब के हजारों साल पहले नबी हजरत इब्राहीम हुए। जिनके निकाह के काफी वक्त गुजरने के बाद दुआ व मन्न्तों से एक बेटा पैदा हुआ। जिनका नाम हजरत इस्माइल रखा गया जिसके लाड़ प्यार में हजरत इब्राहीम मशगूल रहते और बेइंतहा मोहब्बत करत थे। तभी अल्लाह के यहां से इम्तिहान के तौर पर अल्लाह व बेटे की मोहब्बत का वजूद देखने के लिए हुक्म हुआ। कि इस बच्चे को इसकी मां हजरत हाजरा के साथ किसी वीरान जगह पर छोड़ आओ। तो हजरत इब्राहीम ने खुदा के हुक्म को पूरा करते हुए मक्का से कुछ दूर ऐसे जगह पर छोड़ आए जहां न खाना और न ही पानी था। तभी हजरत इस्माइल को प्यास की शिद्दत हुई तो उनकी मां हजरत हाजरा पानी को तलाश करने के लिए वहां मौजूद दो पहाड़ियां सफा व मरबा के बीच दौड़ने लगी। जिसके चलते उन्होंने दोनों पहाड़ियों के सात चक्कर लगाए। तभी जिस जगह पर उनका बेटा इस्माइल अपनी एड़ी रगड़ रहे थे। वहां से पानी का उबाल आया और जिसे रोकने के लिए उनकी मां हजरत हाजरा ने काफी मिट्टी लगाई, लेकिन वह पानी लगातार बहता रहा। इसी बीच पानी को रोकते हुए हजरत हाजरा ने कहा जम-जम’ बस, तब से यही पानी पूरी दुनिया के लिए पाक़ आबे-जमजम’ का पानी बन गया। तब से हज करने वालों को हजरत हाजरा की तरह इन दोनों पहाड़ियों की बीच सात चक्कर लगाने होते हैं। इस मामले के बाद हजरत इब्राहीम अपनी बीवी व लाड़ले बेटे के साथ रहने लगे। जिस वक्त हजरत इस्माइल सात साल के हुए तो हजरत इब्राहीम फिर से अपने अजीज बेटे की मौहब्बत में मशगूल होने लगे। मौलाना यूसुफ कासमी ने बताया कि हजरत इब्राहीम को ख्वाब में हुक्म मिला कि अपनी सबसे खास और अजीज चीज को हमारी राह में कुर्बान करो। इस ख्वाब के चलते सुबह उठते ही हजरत इब्राहीम ने सौ ऊंटों की कुर्बानी दी। दूसरी रात फिर यहीं हुक्म हुआ, फिर इसी सिलसिले के चलते उनकी समझ में आया कि सबसे अजीज तो हमारा प्यारा बेटा इस्माइल हैं। तभी इस बात को हजरत हाजरा व बेटे इस्माइल से बतायी तो वे अल्लाह के हुक्म की तामील करने के लिए राजी हो गये। जिस वक्त हजरत इस्माइल को कुर्बान करने के लिए मीना के मैदान में ले जाया जा रहा था, तो शैतान ने हजरत इब्राहीम व हजरत इस्माइल को बहलाने और फु सलाने की कोशिश की। जिसको उन्होंने कंकर मारकर वहां से भगाया। तभी से सभी हाजी शैतान को कंकर मारकर हज का जरूरी अरकान पूरा करते हैं। जिस वक्त मीना के मैदान में हजरत इब्राहीम ने आंखों पर पट्टी बांधकर अपने प्यारे व लाडले बेटे की गर्दन पर छुरी चलायी तो अल्लाह के हुक्म से उनकी जगह पर दुंबा आ गया। और कुर्बानी के लिए दुंबे को हलाल किया गया। इसलिए सभी हाजी ईदु उल अजहा के मौके पर पसंद के अनुसार कुर्बानी के अरकान को पूरा करते हैं।
किस पर वजिब हैं कुर्बानी
हदीस के अनुसार जिस इंसान पर साढ़े 52 तोले चांदी या साढ़े सात तोला सोना या इसके बराबर की संपत्ति रखता है तो उस पर कुर्बानी वाजिब हो जाती हैं।