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बाबा टिकैत ने सिखाई, लड़नी हक की लड़ाई

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बाबा टिकैत ने सिखाई, लड़नी हक की लड़ाई
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बाबा महेंद्र सिंह टिकैत की 8वीं पुण्यतिथि पर विशेष
बुलंद की थी किसानों की आवाज, उनकी गरजना से हिल जाती थीं सरकार
देश ही नहीं पूरी दुनिया में एक साथ सुर्खियों में रहे थे मेरठ और भाकियू
मेरठ। किसान मसीहा बाबा महेंद्र सिंह टिकैत इतिहास में दर्ज वह नाम है, जिसने देश के भोले-भाले किसानों को बोलना सिखाया। उनके सीने में अपने हक और हुकूक के लिए सरकार से टकराने का माद्दा पैदा किया। वर्ष 1986 में मुजफ्फरनगर के करमूखेड़ी बिजलीघर से उठी किसान आंदोलन की चिंगारी की तपिश को देश की केंद्र और प्रदेश सरकारों ने कई बार महसूस किया। किसानों को आज भी वो दौर याद है, जब भाकियू के रणसिंघे की गरजना से सरकारें थर्रा जाती थीं। टिकैत देश के ऐसे पहले किसान नेता हुए हैं, जिनके दौर में सिसौली सीधे हाटलाइन पर रहती थी।
चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत और उनकी भाकियू के इंकलाबी इतिहास में मेरठ का नाम भी स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। देश ही नहीं पूरी दुनिया में मेरठ और भाकियू एक साथ सुर्खियों में रहे थे। 27 जनवरी 1988 से लेकर 19 फरवरी 1988 तक के वो 25 दिन शायद ही कोई मेरठवासी अभी तक भूल पाया हो। किसानों की समस्याओं को लेकर मेरठ कमिश्नरी के पास सीडीए मैदान में भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौ. महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में लाखों किसान जमा थे। देखते ही देखते सीडीए का मैदान भाकियू के आंदोलन में तब्दील हो गया।
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लखनऊ तक भड़के शोले
लाखों की संख्या में आए किसानों के आंदोलन की आग के शोले लखनऊ तक भड़के। आंदोलन को कुचलने के लिए तत्कालीन कमिश्नर वीके दीवान ने तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह से बात करके 20 कंपनी पीएसी, 11 कंपनी सीआरपीएफ लगाई। आंदोलनकारियों को रोकने के लिए मेरठ-मुजफ्फरनगर मार्ग पर लगातार फ्लैग मार्च कराया। आंदोलन के दौरान सात किसानों की ठंड से मौत भी हुई, लेकिन किसानों ने धैर्य नहीं छोड़ा। यहां सैकड़ों भट्ठियां चढ़ीं, गांवों से खाना बनकर आता रहा। उस वक्त किसानों ने स्वयं ही यातायात व्यवस्था का संचालन किया था। किसी की हिम्मत धरना स्थल की ओर वाहन ले जाने की नहीं होती थी। लोकदल के अध्यक्ष हेमवती नंदन बहुगुणा, पूर्व राज्यपाल वीरेंद्र वर्मा, पूर्व प्रधानमंत्री चौ. चरण सिंह की पत्नी गायत्री देवी, चौ. अजित सिंह, मेनका गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा, शाही इमाम अब्दुल्ला बुखारी समेत देशभर के नेताओं ने टिकैत के आंदोलन का समर्थन किया।
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...और बन गए किसानों के मसीहा
आंदोलन के 24 दिन बाद प्रदेश सरकार की ओर से मंत्री सईदुल हसन व हुकुम सिंह ने आकर वार्ता की। इस पर यहां धरना तो समाप्त हो गया, लेकिनटिकैत ने प्रदेश सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन चलाने की घोषणा कर दी थी। उन्होंने किसानों से बिजली के बिल न देने की अपील की थी। कहा कि किसी भी बिजली अधिकारी को गांव में न घुसने दें। इसका असर हर गांव में हुआ। इस आंदोलन से ही टिकैत किसानों के मसीहा बने और देश दुनिया में नाम बुलंद हुआ। यही आंदोलन था, जिसके बाद टिकैत ने 25 अक्तूबर 1988 को नई दिल्ली स्थित वोट क्लब पर आंदोलन का बिगुल फूंका था।
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