मेरठ। फायर एक्सपर्ट की मानें तो शनिवार रात जलते टैंक के पास का तापमान 450-500 डिग्री के बीच था। रविवार को दिन में यह तापमान 600 डिग्री तक पहुंच गया था।
एफएसओ मुकेश कुमार ने बताया कि वह विदेश में ट्रेनिंग करने के अलावा आग की कई बड़ी घटनाओं पर पहुंचे। लेकिन यह उनके कार्यकाल की सबसे भीषण आग थी। रविवार दोपहर जब तापमान का आकलन किया गया तो टैंक के पास 400 से 600 डिग्री तापमान था। टैंक से करीब 70 मीटर दूरी पर भी तापमान दिन के समय 80 से 90 डिग्री था। दमकल गाड़ियों को भी टैंक से 70 मीटर दूरी पर खड़ा किया था। जबकि हाईड्रोलिक प्लेटफार्म मशीन की लिफ्ट से जो जवान आग बुझा रहे थे, उनकी दूरी टैंक से करीब 80 मीटर की थी। किसी भी स्थिति में 60 मीटर दूरी से आग की तरफ नहीं जाया गया। फायर कर्मियों और जवानों पर अलग से लगातार पानी की बौछारें की जा रही थीं। उसके बाद भी 60 मीटर दूर खड़ी फायर ब्रिगेड गाड़ियों की लाइटें पिघल गई थीं। टायरों पर भी खतरा था। शनिवार दोपहर से जो गाड़ी स्टार्ट हुई थी उन गाड़ियों पर लगातार पानी डालकर ठंडा किया जा रहा था।
अल्कोहल से भरे टैंक की चादर 10 एमएम की थी, जिसे पिघलने में ज्यादा समय नहीं लगा। डिस्टलरी में हुए ब्लास्ट के बाद रविवार को 100 मीटर तक शीशे, दरवाजे और लाइटें टूटी हुई मिलीं। दमकल गाड़ियों में जहां भी प्लास्टिक थी, वह पिघल गई। जितनी दूर से फायरकर्मी आग बुझा रहे थे यदि उनके कपड़े गीले नहीं होते तो एक मिनट में ही वह चक्कर खा जाता या उसके कपड़ों में आग लगने का खतरा था। 600 डिग्री तापमान ने अल्कोहल के अन्य सभी टैंकों की चादर को लाल कर दिया। अल्कोहल की आग 100 डिग्री तापमान पर पेट्रोल से ज्यादा भीषण हो जाती है।
खास बातें:
आग बुझाने में जुटे जवानों और फायर कर्मियों पर की जा रही थी पानी की बौछारें