फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

550 किसान बने कछुओं के पालनहार

विज्ञापन
विज्ञापन
550 किसान प्रकृति को बचाने की मुहिम से जुड़ चुके
विज्ञापन

- हस्तिनापुर, बिजनौर, बुलंदशहर के बाद मुजफ्फरनगर में भी खोली जा रही हैचरी
- गंगा किनारे के क्षेत्र से किसान दे रहे डब्लूडब्लूएफ की टीम को कछुओं के अंडों की जानकारी
मेरठ। गंगा किनारे गांवों में रहने वाले किसान अब सब्जी-फसल उगाने के साथ ही प्रकृति को बचाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। वन विभाग और डब्लूडब्लूएफ की मुहिम के बाद अब वह कछुओं के संरक्षण को लेकर आगे आ रहे हैं। जहां अब वे कछुओं के अंडों की देखरेख कर रहे हैं। वहीं, डब्लूडब्लूएफ की टीम को इसकी जानकारी देकर कछुओं की संख्या बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं। अब तक करीब 550 किसान इस मुहिम से जुड़कर गंगा को निर्मल बनाने में सहयोग कर रहे हैं।
दुनिया में इंसान हो या जीव जंतु, सभी अपने बच्चों की पैदाइश से लेकर बड़े होने तक उनकी देखभाल करते हैं। लेकिन कछुओं के मामले में ऐसा नहीं है। कछुए अंडे तो देते हैं। लेकिन वे इसके बाद अपने बच्चों को देख नहीं पाते। कछुओं के अंडे देने का समय नवंबर से अप्रैल तक होता है। लेकिन इन सभी अंडों का पूर्ण विकास जून में होता है। मादा कछुआ नदी से निकलकर 30 से 40 मीटर तक जमीन पर आती है। वह कई जगहों पर रेत खोदकर गड्ढा बनाती है। जहां उसे अनुकूल लगता है कि उसके अंडे सुरक्षित रहेंगे, वहां मादा कछुओं की कुछ प्रजातियां एक बार में चार, छह तो कुछ 15-30 अंडे देती हैं। मादा कछुआ इस प्रकार से अंडे रखती हैं कि जून माह में उनमें से बच्चे निकलने के बाद वह सीधे नदी की तरफ चले जाते हैं। अंडों के रखे जाने से बच्चे निकलने का जो समय होता है, वही गंगा किनारे सब्जी और प्लेज लगाने का होता है। ऐसे में गंगा किनारे गांवों के जो किसान प्लेज लगाते हैं, उसमें खुदाई की वजह से अधिकतर अंडे नष्ट हो जाते हैं।
विज्ञापन

तीन हजार कछुए छोड़े जा चुके गंगा में
डब्लूडब्लूएफ के सीनियर कोऑर्डिनेटर संजीव यादव बताते हैं कि साल 2013 में कछुओं के संरक्षण के लिए वन विभाग और डब्लूडब्लूएफ की तरफ से कछुआ संरक्षण कार्यक्रम शुरू कर इसमें किसानों की सहभागिता ली गई। किसान जागरूक होने लगे तो अब तक तीन हजार कछुए गंगा में छोड़े जा चुके हैं। दरअसल पहले किसान खेती करने के लिए हजारों अंडों को ऐसे ही फेंक देते थे। जिससे गंगा नदी में पाई जाने वाली कछुओं की 12 प्रजातियों में अधिकांश संकटग्रस्त या अति संकटग्रस्त सूची में आ गईं।
वैज्ञानिक तरीके से किए जाते हैं शिफ्ट
अब किसान खुद फोन करके बताते हैं कि यहां पर अंडे रखे हैं। डब्लूडब्लूएफ की टीम वहां पहुंचकर इन खास स्थान को वैज्ञानिक विधि द्वारा नदी किनारे बनाई गईं हैचरी में शिफ्ट कर देती है। जून में बच्चे निकलने के बाद इनको हस्तिनापुर में बनाए गए आधुनिक तालाब में उचित तापमान में रखा जाता है। बाढ़ खत्म होने के बाद इन बच्चों को गंगा में छुड़वाया जाता है।
विज्ञापन

खोली जा रही चौथी हैचरी
छह साल में परिवर्तन यह आया है कि अब तक साढ़े पांच किसान संस्था से जुड़ चुके हैं। बुलंदशहर के अहार गांव में हस्तिनापुर के मखदूमपुर और बिजनौर में विदुर कुटीर के बाद अब चौथी हैचरी मुजफ्फरनगर में बिजनौर बैराज से ऊपर सलोनी में बनाई जा रही है। -संजीव यादव, सीनियर कोऑर्डिनेटर, डब्लूडब्लूएफ
--
ऐसे जागरूक किसानों को लगातार सम्मानित किया जाता है। ताकि दूसरे किसान भी प्रकृति को बचाने में भूमिका निभाएं। -अदिति शर्मा, डीएफओ
कछुओं के बारे में
- मादा कछुआ नदी किनारे रेत में घर बनाकर अंडे देती है
- अंडों की हैचिंग (बच्चे निकलने की प्रक्रिया) प्राकृतिक तरीके से अपने आप होती है
- कछुए यह मृत जीवों को खाकर प्रदूषण खत्म करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इन्हें जल तंत्र का गिद्घ भी कहा जाता है।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें