देवबंद (सहारनपुर)। सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता फरहा फैज को अब शरई अदालत के नाम पर आपत्ति है। हालांकि उन्होंने साफ कर दिया कि उन्हें ऐसे केंद्र के काम से कोई आपत्ति नहीं है। बस, इसका नाम मीडिएशन सेंटर (मध्यस्थता केंद्र) होना चाहिए, क्योंकि अदालत शब्द का इस्तेमाल करने का अधिकार किसी गैर सरकारी संगठन को नहीं है। तीन तलाक, निकाह हलाला, बहु विवाह, मुता और मिस्यार (कॉन्ट्रैक्ट मैरीज) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं की पक्षकार और पैरोकार फरहा फैज सोमवार को फिर से मीडिया के सामने आईं और देवबंदी उलमा द्वारा की गई टिप्पणी का जवाब देते हुए कहा कि वह अपना काम अच्छे से कर रही हैं, इसलिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि की जरूरत नहीं है।
यहां एक प्रेस कांफ्रेंस में फरहा ने कहा कि दारुल कजा (शरई अदालत) जिस तरह का काम करती हैं उसके अनुसार उसका नाम मिडिएशन सेंटर रखा जाना चाहिए। एक देश और एक संविधान में दो-दो अदालतें नहीं हो सकतीं। तीन तलाक, बहुविवाह और ट्रिपल तलाक का विरोध करते हुए कहा कि जिस तरह हिंदू और ईसाई मैरिज एक्ट बना हुआ है उसी तरह मुस्लिम मैरिज एक्ट का होना भी जरूरी है। मुस्लिम बच्चे मदरसों तक सीमित न रहकर उच्च शिक्षा ग्रहण कर मुख्यधारा से जुड़ें इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मांग की है कि देश में ऐसा विश्वविद्यालय स्थापित किया जाए जहां धार्मिक शिक्षा के साथ साथ आधुनिक शिक्षा भी दी जाए। एक सवाल पर फरहा ने कहा कि उनका राजनीति में आने का कोई इरादा नहीं है, बल्कि मजबूती के साथ महिला अधिकारों की लड़ाई लड़ना है और इस दिशा में वह लगातार काम कर रही हैं। इस दौरान भाजपा नगर अध्यक्ष गजराज सिंह राणा, विनोद वर्मा, ठा. सुरेंद्रपाल सिंह आदि मौजूद रहे।
टिप्पणी पर माफी मांगे फरहा : उलमा
देवबंद। दारुल उलूम और मुस्लिम धर्मगुरुओं पर बयानबाजी को लेकर देवबंदी उलमा ने सख्त नाराजगी जताए हुए कहा कि फराह को उलमा से माफी मांगनी चाहिए और सरकार फरहा पर कार्रवाई करे।ु फरहा ने रविवार को कहा था कि दारुल उलूम की विचारधारा के मदरसे आतंक की शिक्षा देते हैं। अगर उलमा की फतवों की दुकान बंद हो गई तो उनके पास कुछ नहीं बचेगा। इस पर मजलिस इत्तेहाद-ए-मिल्लत के प्रदेशाध्यक्ष मुफ्ती अहमद गौड ने कहा कि संविधान में मुसलमानों का पूरा विश्वास है और संविधान ने ही उन्हें धर्म के अनुसार जीवन गुजारने का अधिकार दिया है। हमें कोई भी गलत काम करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। फरहा फैज वकील हैं और वे केवल वकालत करें, मजहब में हस्तक्षेप न करें। उन्हें इस्लाम धर्म का जरा भी ज्ञान नहीं है और वह गलत बयानबाजी के लिए उलमा से माफी मांगें। उनके बयान नफरत और घृणा पैदा करने वाले हैं जिनसे मुल्क का माहौल खराब हो सकता है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह फरहा फैज पर कार्रवाई करे। (ब्यूरो)