93 साल में 16 बार बिकी हापुड़ अड्डा चौराहा की सरकारी जमीन
सरकारी जमीन पर निर्माण शुरू होने के बाद हुई शिकायत के बाद जागा प्रशासन
मेरठ। हापुड़ अड्डा चौराहा के पास खसरा नंबर 4632 की सरकारी जमीन पर बने कांप्लेक्स पर बिल्डर ने अपना हक जताया है। बिल्डर के अनुसार इस जमीन को उसने 2016 में 12 अलग-अलग रजिस्ट्री कर 1.50 करोड़ रुपये में खरीदा है। यह संपत्ति अब तक 16 बार बेची जा चुकी है। वहीं राजस्व विभाग के दस्तावेजों में आज भी यह जमीन नजूल में दर्ज है।
ये है पूरा मामला
सरकारी जमीन पर कांप्लेक्स खड़ा होने पर अमर उजाला ने इसका खुलासा किया था। मामला खुलने पर एमडीए की टीम ने 4 जुलाई को उक्त कांप्लेक्स की दुकानों पर सील लगा दी। वहीं अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व ने सभी 93 कब्जेदारों को नोटिस जारी करते हुए कब्जेदारों से मालिकाना हक के संबंध में 10 जुलाई तक साक्ष्य सहित जवाब मांगा है।
बिल्डर ने किया वाद दायर को दिया प्रार्थना पत्र
एमडीए ने जिस कांप्लेक्स को सील किया है, उसके बिल्डर ने सिविल जज के यहां वाद दायर करने को प्रार्थना पत्र दिया है। जिसमें बिल्डर ने जिस जमीन पर कांप्लैक्स निर्माण किया गया है, उसका 1924 से अब तक का इतिहास बताया है। जिसमें कहा गया है कि पहली बार 1924 में एक अंग्रेज महिला एलिस एम फिटर पैट्रिक ने इस संपत्ति को मेरठ शहर निवासी अलाउद्दीन व मुइनुद्दीन को पांच हजार रूपये में बेचा था। इसके बाद से यह संपत्ति बिकती गयी, जिसे बाद में कुछ टुकड़ों में भी बेचा गया। बिल्डर ने 2016 में इस जमीन को 12 अलग-अलग रजिस्ट्री के माध्यम से कुल 1.50 करोड़ रुपये में खरीदा।
कलक्ट्रेट के रिकार्ड रूम में 1924 के पहले का रिकार्ड
तहसील में नजूल की भूमि का 1924 तक का रिकार्ड उपलब्ध है, जबकि उससे पहले का रिकार्ड कलक्ट्रेट के रिकार्ड रूम में है। तहसील सूत्रों के अनुसार बीएवी मैदान वाली जमीन 1902 में नजूल में दर्ज हुई थी और यह जमीन भी उसके बराबर में ही है। ऐसे में इस जमीन को भी 1902 में नजूल दर्ज किया गया जाना तय है। मामले में एक बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि किसी भी जमीन का विक्रय होने पर तहसील अभिलेखों में उसके मालिक का नाम बदला जाता है। जिसे राजस्व विभाग की भाषा में दाखिल खारिज कहा जाता है। लेकिन खसरा नंबर 4632 आज भी तहसील अभिलेखों में नजूल की भूमि दर्ज है, जिस पर जिला प्रशासन का मालिकाना हक बताया गया है।