मेरठ। भाजपा में महापौर प्रत्याशी को लेकर शुरू से ही अजीब सा माहौल पैदा हो गया था। जिस उत्साह के साथ चुनाव की तैयारी होनी चाहिए थी, वह कहीं नजर नहीं आयी। इसका बड़ा कारण आरक्षण घोषित होने के बाद ही प्रत्याशी के रूप में कांता कर्दम का नाम पहले से तय होने की बात भाजपाई कर रहे हैं।
कांता कर्दम भाजपा में पिछले सात वर्षों में तेजी से आगे बढ़ी हैं। पहले वह क्षेत्रीय कमेटी में रहीं तो इस समय प्रदेश भाजपा में उपाध्यक्ष हैं। क्षेत्रीय अध्यक्ष और पंचायत राज मंत्री चौ. भूपेंद्र सिंह पार्टी में उनके सबसे बड़े हितैषी माने जाते हैं। नगर निगम महापौर पद का जैसे ही आरक्षण तय हुआ और सीट अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित हुई, तभी पार्टी में लगभग तय मान लिया गया था कि प्रत्याशी कांता कर्दम ही होंगी। यहीं से पार्टी में उदासीनता शुरू हो गयी।
जैसी पार्टी में चर्चा थी, वैसा ही हुआ। प्रत्याशी चयन को तमाम औपचारिकताओं का दौर चला लेकिन अंत में कांता कर्दम ही प्रत्याशी घोषित हुईं। चूंकि कांता कर्दम प्रदेश उपाध्यक्ष के साथ प्रांतीय नेताओं की करीबी मानी जाती हैं, ऐसे में तमाम स्थानीय कार्यकर्ता और नेता उनके कद के आगे खुद को बौना मान सही तरीके से संवाद स्थापित नहीं कर पाए। वहीं महानगर के मठाधीश नेता भी कांता कर्दम के आने से चुनाव में होने वाले खेल को पूरी तरह नहीं खेल पाए और किनारे हो गए।
पैसा भी आया आड़े
नगर निगम महापौर पद के साथ करीब 20 ऐसे पार्षद प्रत्याशियों के लिए जो आर्थिक रूप से कमजोर थे, पार्टी फंड से पैसा आया। लेकिन करोड़ रुपये से ज्यादा में लड़े जाने वाले महापौर पद के चुनाव में पार्टी से आया पैसा जहां ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुआ तो कांता कर्दम भी उतनी समर्थ नहीं थी कि खुलकर चुनाव में पैसा खर्च कर पातीं। ऐसे में तमाम ऐसे छुटभैया नेता जो चुनाव को साधने के माहिर माने जाते हैं, वह विपक्षी खेमे में ट्रांसफर हो गए।
एक तीर से दो निशाने
कांता कर्दम की हार को कुछ भाजपाई नियोजित योजना भी बता रहे हैं। जिसमें भाजपा के कुछ बड़े लोग शामिल हैं। ये लोग पिछले पांच साल में तेजी से आगे बढ़े चौ. भूपेंद्र सिंह पर निशाना लगाना चाहते थे। क्योंकि कांता कर्दम का टिकट कराने में भूपेंद्र सिंह की भूमिका अहम रही थी। ऐसे में उनकी हार के साथ एक तरफ जहां कांता कर्दम को झटका दिया गया, वहीं संगठन में चौ. भूपेंद्र सिंह जिन्हें क्षेत्रीय अध्यक्ष के साथ एमएलसी मनोनीत करते हुए बाद में मंत्रिमंडल में जगह देकर पंचायत राज विभाग का मंत्री बना दिया गया, कई बड़े नेताओं को हजम नहीं हो रहा था।
खास बातें:
- महापौर आरक्षण घोषित होने के बाद ही भाजपा मेें शुरू हो गयी थी चर्चा
- आरक्षण के साथ ही कांता कर्दम को मान लिया गया था भाजपा प्रत्याशी
- कांता कर्दम के कद और रसूख से भाजपाइयों में पहले ही थी बेचैनी