मेरठ। राजा-रानी, परी और राजकुमार की कहानी सुनने वाले बच्चे अब ऑनलाइन वीडियो देखकर बड़े हो रहे हैं। हर हाथ में स्मार्ट फोन और इंटरनेट की फोर जी की स्पीड ने बड़ों के साथ बचपन को कब्जे में ले लिया है। मम्मियों ने लाड़ले को स्मार्ट बनाने के चक्कर में उसे इंटरनेट की दुनिया में धकेल दिया है। जहां डेढ़ साल से आठ साल के बच्चे ऑनलाइन वीडियो, कहानियां सुनकर मनोरंजन कर रहे हैं। अब दादी-नानी नहीं बल्कि यूट्यूब बच्चों को कहानियां सुना रहा है। स्कूलों में शिक्षकों की बजाय जीवीआर और साउंडप्रूफ स्टूडियो बच्चों को चंपक वन, अकबर और बीरबल के किस्से सुना रहे हैं। बदलते माहौल में बच्चों की परवरिश का अंदाज भी बदल गया है।
ऑनलाइन कहानियां सुनने के बड़े नुकसान
बच्चों में बढ़ रही डर, तनाव, अकेलापन, चिड़चिड़ापन की प्रवृत्ति।
कम उम्र में ही बढ़ रही आंखों की समस्या।
अभिभावक, शिक्षक से कट रहा बच्चों का संवाद।
बच्चों में शेयरिंग की आदत का नहीं हो रहा विकास।
माता-पिता के साथ नहीं बन रहा मजबूत संबंध।
याददाश्त, दिमाग में कमजोरी व बच्चे की रचनात्मकता में आ रही गिरावट।
ऑडियो विजुअल वाली कहानियां पसंद
डेढ़ साल से आठ साल के बच्चों में ऑनलाइन कहानियां, यूट्यूब वीडियो और कार्टून देखने की खासी दीवानगी है। बचपन में चित्र देखकर बच्चे खुद कहानी बनाकर सुनाते थे। वहीं अब बच्चों को ऑडियो वीडियो वाली पूरी कहानी चाहिए। जिसमें चूहे से लेकर उनका हर पसंदीदा किरदार अपने डॉयलाग बोले और हरकतें करता नजर आए। थ्रीडी और हाई डायमेंशन वाली पिक्चर क्वालिटी में बच्चे कहानियां सुन नहीं बल्कि देख रहे हैं।
शिक्षकों की जगह ऑनलाइन वीडियो ट्रेेंड
प्ले स्कूलों के साथ नामचीन स्कूलों के किंडरगार्डन सेक्शन में बच्चों को वीडियो से शिक्षा दी जा रही है। कक्षा में शिक्षक नहीं बल्कि बड़ी स्क्रीन बच्चों को कहानियां सुनाती हैं। महंगे स्कूलों में साउंड प्रूफ स्टोडियो बनाकर बच्चों को रोचक कहानियां दिखाई जा रही हैं। कुछ विद्यालयों ने बच्चों को कहानी सुनाने के लिए जीवीआर की सुविधा उपलब्ध करा दी है। बच्चा घर से लेकर विद्यालय में अधिकांश वक्त गैजेट्स के साथ वर्चुअल वर्ल्ड में बिता रहा है। स्कूल के इसके लिए महंगी फीस भी वसूल रहे हैं। अभिभावक और शिक्षकों का स्थान गैजेट ले चुके हैं।
बच्चों की पसंदीदा ऑनलाइन कहानियां
सिंड्रेला, बेडटाइम स्टोरीज, मिकी माउस, द टाइगर हू कम टू टी, माय फ्रैंड गणेशा, कुंगफू पांडा, हन्नामोंटाना, फ्रीसबर्ग, स्पूकी, एल्बीक्यू टर्की, लिटिल मेरमेड, टॉकिंग टॉम, गुडनाइट सर्कस, बाबर एवं फे यरी टेल्स आदि।
व्यस्त हैं अभिभावक
वर्तमान में माता-पिता के पास बच्चे के लिए समय ही नहीं बचा है। नौकरी और अन्य कारणों से अधिकांश महिलाएं बच्चों पर ध्यान नहीं दे पा रही हैं। एकल परिवार भी बड़ा कारण है। दादा-दादी बच्चों के पास नहीं रहते, जिस कारण वह इंटरनेट की तरफ रुख कर रहे हैं।
अभिभावकों से कट रहा संवाद
इंटरनेट, गैजेट्स और यूट्यूब के अधिक प्रयोग के कारण बच्चों और अभिभावकों के बीच संवाद कट रहा है। बचपन से ही बच्चा गैजेट्स में व्यस्त हो रहा है। मम्मियां टेक्नोलॉजी फ्रैंडली बनाने के चक्कर में बच्चे को स्वयं से दूर कर रही है। गैजेट्स इंसान की जगह नहीं ले सकते। बच्चे की सही परवरिश के लिए जरूरी है कि अभिभावक स्वयं बच्चों को वक्त दें, उनके साथ सोएं, उनसे बात क रें। - डॉ. पूनम देवदत्त, वरिष्ठ मनोचिकित्सक व काउंसलर
तेजी से बदल रहा बाल मनोविज्ञान
डेढ़ दो साल की आयु से ही बच्चे का अधिकांश वक्त एंड्रायड फोन और लैपटॉप पर बीत रहा है। बच्चों की जिंदगी में गैजेट की घुसपैठ इतनी बढ़ चुकी है कि पूरा बाल मनोविज्ञान ही तेजी से बदल रहा है। बच्चा यूट्यूब पर मनचाहा गेम खेलता है, कहानी का वीडियो देखता है इससे बच्चों में शेयरिंग की भावना खत्म हो रही है। बच्चों में चिड़चिड़ापन, एडोलेंस, तनाव बढ़ रहा है। सिरदर्द, आंखों में कमजोरी और याददाश्त कमजोर होने वाले मानसिक विकार भी बढ़ रहे हैं। चित्र देखकर कहानी बनाने का काम खत्म हो चुका है। - डॉ. रवि राणा, वरिष्ठ मनोचिकित्सक एलएलआरएम
बच्चे के विकास में घातक
बच्चे को अपने साथ सुलाना, स्पर्श देना और स्तनपान कराना बच्चे के विकास की अनिवार्य परंपराएं हैं। मां के स्पर्श से बच्चे में आत्मविश्वास और साहस बनता है। मां जब बच्चे को कहानी सुनाकर सुलाती है तो मां-बच्चे के बीच मातृत्व और प्यार का रिश्ता गहराता है। लेकिन अब बच्चा इंटरनेट पर कहानी सुन रहा है, अलग कमरे में सोता है इससे बच्चों में डर, अकेलापन और चुपचाप रहने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। बच्चे के विकास और उम्र के अनुपात में भारी अंतर आ रहा है। डॉ. राजीव तेवतिया, बाल एवं शिशु रोग विशेषज्ञ