सपा के वाल्मीकि कार्ड से गड़बड़ाई भाजपा की रणनीति
मेरठ।
नगर निगम चुनाव में शह और मात का खेल शुरू हो गया है। भाजपा और उसके विपक्षी दलों के बीच बहुत ही सधी हुई रणनीति चल रही है। अप्रत्यक्ष रूप से कहीं न कहीं विपक्षियों का मकसद भाजपा को रोकने का नजर आ रहा है। ऐसे में सपा द्वारा महापौर पद पर वाल्मीकि कार्ड खेले जाने से कहीं न कहीं भाजपा की रणनीति गड़बड़ाती नजर आ रही है।
नगर निगम चुनाव में भाजपा का पलड़ा हमेशा भारी माना जाता है। क्योंकि चुनाव सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर टिका होता है। लेकिन इस बार सीट अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित होने पर गणित कुछ गड़बड़ा गया है। पहली बार सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने पर मुस्लिम वर्ग सिर्फ मतदान में शामिल रहेगा। ऐसे में मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण किसी पार्टी के लिए नहीं बल्कि भाजपा के खिलाफ मजबूत प्रत्याशी की तरफ होने की पूरी संभावना जताई जा रही है।
बसपा ने पूर्व विधायक योगेश वर्मा की पत्नी सुनीता वर्मा को प्रत्याशी घोषित कर दलित कार्ड खेला है। जबकि सपा ने दीपू मनोठिया के रूप में वाल्मीकि कार्ड खेला है। सपा के इस कार्ड ने भाजपा के गणित को गड़बड़ा दिया है। क्योंकि दलित बसपा का मूल वोट बैंक माना जाता है और नगर निगम की सूची में करीब डेढ़ लाख दलित मतदाता हैं। जबकि इसके विपरीत वाल्मीकि मत जो कि करीब 25 हजार हैं, वह मूल रूप से भाजपा के वोटर माने जाते थे, लेकिन वाल्मीकि प्रत्याशी के आने पर भाजपा का यह वोट बैंक किसी हद तक खिसक सकता है। ऐसे में दलित वोट बैंक को देखते हुए यदि मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण बसपा की तरफ हुआ तो भाजपा के लिए चुनाव चुनौतीपूर्ण बन सकता है। इसी गणित में भाजपा के दिग्गज उलझ कर रह गए हैं।
नगर निगम में 11.22 लाख मतदाता है। इनमें मुस्लिमों की संख्या करीब चार लाख है और दलित 1.50 लाख के आसपास हैं। जो कुल वोट के लगभग आधे बैठते हैं। ऐसे में सपा की चाल के बीच भाजपा उलझ गई है। वहीं दूसरी तरफ अभी कांग्रेस और रालोद जैसे दल भी भाजपा को पटखनी देने के उद्देश्य से प्रत्याशी चयन में जुटे हैं। यदि विपक्षी की यह गोपनीय साझा रणनीति कामयाब हुई तो निगम चुनाव में जीत इस बार भाजपा के लिए चुनौती बन सकती है।
खास बात
अप्रत्यक्ष रूप से विपक्षियों का मकसद भाजपा को रोकने का आ रहा नजर
मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण से भी बढ़ रही ज्यादा परेशानी