... Zainab kept giving rokar always, save Abbas
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घोसी। बड़ागांव स्थित मदरसा हुसैनिया से सोमवार की देर रात दुलदुल और अलम का जुलूस उठाया गया। जो सदर इमामबारगाह पर दफन किया गया। इस दौरान रास्तेभर अजादार मातम करते और नौहा पढ़ते चल रहे थे। नौहे ‘जैनब दरे खैमा से सदा देती थी रोकर, अब्बास बचा लो मेरे अब्बास बचा लो’ ने अजादारों को रुला दिया जुलूस की शुरुआत मौलाना मजाहिर हुसैन की मजलिस से हुई। मौलाना ने कहा कि 28 रजब 60 हिजरी को इमाम हुसैन काफिला लेकर मदीने से चले थे। दो मोहर्रम को उनका घोड़ा एक स्थान पर रुक गया। इमाम ने पता लगवाया कि जगह का नाम क्या है। किसी ने नैनवां बताया तो किसी ने सित्ताये फोरात। एक बूढ़े ने कहा मौला इसे कर्बला भी कहते हैं। र्बला का नाम सुनते ही हुसैन घोड़े से उतरे। एक मुट्ठी मिट्टी लेकर सूंघा और वहीं खेमे लगाने को कहा। नहरे फोरात के किनारे खेमे लगाए गए। इसी वाक्यात के मद्देनजर जुलूस निकाला गया। अंजुमन सज्जादिया के नौहे ‘कुछ देर को ऐ आँखों की बिनाई लौट आ अकबर को ढूंढ लू अली अकबर को ढूंढ लू’ और ‘जैनब दरे खैमा से सदा देती थी रोकर अब्बास बचा लो मेरे अब्बास बचा लो’ सुनकर अजादारों की आंखें नम हो गईं। इस दौरान ग़जनफर अब्बास, शमीम हैदर, इफ़्तेख़ार हुसैन, शाहिद हुसैन, तफहीम हैदर, अली हैदर, गुलाम हैदर, अहमद औन, लुकमान हैदर समेत भारी संख्या में लोग मौजूद रहे। सुरक्षा के मद्देनजर पुलिस की तैनाती की गई थी।