तमसा अब अविरल बहेगी और निर्मल रहेगी। अमर उजाला ने ‘तमसा का दर्द’ को उकेरा तो लोग जुड़ते चले गए। प्रशासन के साथ ही जनता ने नदी की तकलीफ को समझा और सब नदी के किनारे उमड़ पड़े। जिलाधिकारी वैैभव श्रीवास्तव के नेतृत्व मंगलवार को हनुमानघाट से ‘निर्मल तमसा’ अभियान शुरू हुआ तो लोग जुड़ते चले गए और कारवां तैयार हो गया। नौजवान और बुजुर्ग हर किसी ने नदी से कचरा निकालना शुरू किया। नदी के बीच में बने बालू और मिट्टी के टीलों को जेसीबी की मदद से हटाया जाने लगा।
अमर उजाला ने पहली जून से ‘तमसा का दर्द’ बयान करना शुरू किया। नदी की बदहाली और व्यथा से रूबरू होने के बाद प्रशासन और मऊ वासियों को महसूस हुआ कि अब वक्त आ गया है जब अपनी नदी को निर्मल बनाना जरूरी है। जिलाधिकारी वैभव श्रीवास्तव ने 12 जून को कलेक्ट्रेट सभागार में अफसरों, स्वयंसेवी संगठनों, क्लबों के पदाधिकारियों की बैठक बुलाई और उनकी राय-बात से ‘निर्मल तमसा’ अभियान की कार्ययोजना तैयार की। अभियान की शुरुआत मंगलवार को सुबह छह बजे हनुमान घाट से जिलाधिकारी ने की और वह खुद फावड़ा-टोकरी लेकर नदी को साफ करने उतरे। जिलाधिकारी वैभव श्रीवास्तव ने कहा कि निर्मल तमसा का महत्व पौराणिक है। इस जीवनदायिनी नदी को निर्मल रखना सबकी जिम्मेदारी है।
स्कूल, दफ्तर खुले होने के बावजूद लोग सुबह पहुंचे और दिन में 10 बजे तक नदी की सफाई करते रहे। रोटरी क्लब, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, ठेकेदार संघ, उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षक संघ, उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ, बीटीसी प्रशिक्षु, एनसीसी, एनएसएस और स्वयंसेवी संगठनों के पदाधिकारियों ने पूर्व निर्धारित स्थल पर सफाई की, उसके बाद अपने काम पर गए।
अगले 10 दिनों तक चलने वाले इस अभियान के लिए नदी को 14 सेक्टरों में बांट कर अधिकारियों, कर्मचारियों और सफाई कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई है और क्लबों और संगठनों को भी जिम्मेदारी दी गई है। सब तय सेक्टर में सफाई करते रहे। नदी के बीच से सड़े कपड़ों, प्लास्टिक, जलकुंभी, घास आदि को निकालने के लिए नावें लगाई गई हैं जबकि बीच नदी में बने रेत के टीलों को जेसीबी से खोदा जा रहा है।