मऊ। शहर के संपूर्ण बंदी की अवधि में लंबे समय से बैंकों की बंदी ने बुनकरों और बुनाई से जुडे़ लाखों लोगों को बेरोजगार कर दिया है। बुनकरों को साड़ियों की बुनाई की मजदूरी तक नहीं मिल पा रही है। साड़ियों की बुनाई से जुड़े धंधों में काम कर आजीविका चलाने वाले शहर के लाखों कामगार पिछले दो हफ्तों से मजदूरी नहीं मिलने से तंगहाली के कगार पर पहुंच गए हैं।
साड़ियों की बुनाई कराकर बाहर भेजवाने वाले थोक कारोबारियों को बैंकों की बंदी के चलते बाहर के जो व्यापारी रुपये भेज भी रहे हैं, शहर में बैंकों की बंदी के चलते कारोबारियों के बाहर के चेकों का क्लीरेंस नहीं हो पा रहा हैं। शहर के एटीएम भी खाली पड़े हैं। कोरोना संकट के चलते शहर में लगभग अधिकांश गलियां सील हैं। बैंकों की बंदी से गृहस्थ नगदी की निकासी नहीं कर पा रहे हैं। बुनाई व्यवसाय में शहर के कई लाख लोग प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। साड़ियों की बुनाई करने वाले बुनकर जिनमें शहर से लेकर देहातों तक से कारीगर लूमों पर काम करने के लिए आते हैं।
धागों की रंगाई करने वाले, नरी भरने वाले, धागे टूटने पर उसे जोड़ने वाले कारीगर, साड़ियां तैयार हो जाने पर उनकी कटिंग में हजारों मजदूरों को रोजगार मिलता है। इसमें पुरुषों से लेकर महिलाओं तक को काम मिलता है। इनके अलावा बुनी गई साड़ियों को तह करने वाले मजदूर, साड़ियों में पेपर लगाने वाले, एंब्रायडरी में लगे कारीगर, साड़ियों के गट्ठर बनाने वाले मजदूर, साड़ियों पर स्टीकर लगाने वाले मजदूर, साड़ियों को पेटियों में पैक करने वाले कारीगर, गांठों के ऊपर प्लास्टिक लगाने वाले, गत्ते बेंचने वाले, साड़ियों की पेटियों और गांठों की ढुलाई करने वाले पल्लेदार और रिक्शा ट्राली चलाने वाले लोगों की रोजी रोटी बंद हो गई है। पूर्व पालिकाध्यक्ष अरशद जमाल कहते हैं कि बैंकों की बंदी से बुनाई से जुड़े कई लाख लोग प्रभावित हैं। उनका कहना है कि गाइड लाइन का पालन करते हुए बैंकों को खोलने से लाखों बुनकरों को मजदूरी का भुगतान करने में मदद मिलेगी।