मऊ।
नगर की ऐतिहासिक रामलीला में दूसरे दिन प्रभु श्री राम वन जाने के लिए घर से निकले। पिता के द्वारा दिए गए वचन को पूरा करने और रघुकुल की मर्यादा को निभाते हुए जैसे ही प्रभु वन जाने को तैयार हुए। उनके संग माता सीता भी जाने के लिए जिद् कर बैठी। अभी वो सीता मैया को समझा ही रहें थे कि लखनलाल भी उनके सेवक के रूप में वन जाने को अड़ गए। इस दौरान पूरी अयोध्या में सन्नाटा छा गया था। नगर में किसी भी घर में चूल्हे नहीं जले।
मैया सीता और लखनलाल को समझाने में प्रभु को कई दिन लग गए। इस पर वो उन्हें भी अपने साथ वन ले चलने के लिए तैयार हो गए। इस दौरान प्रभु जैसे ही राजसी वस्त्र को त्याग कर तापस वस्त्र धारण कर माता सीता और भैया लखन लाल के संग महल से निकले, तो नगरवासियों ने उन्हें घेर लिया। नगरवासियों ने कहा कि वो उन्हें छोड़कर नहीं जाने देंगे। अगर जाना है तो प्रभु उन्हें भी अपने संग लेकर चले।
नगरवासियों के हठ के आगे प्रभु अधीर और बेबस हो गए। ऐसे में उन्होंने निर्णय लिया कि रात के अंधेरे में प्रस्थान करेंगे। इस पर राजा दशरथ को कुछ आस जगी की हो न हो राम अब रुक जाए। उन्होंने अपने मंत्री सुमंत को बुलाया बोले सुमंत तुम राम को रथ पर बिठाकर ले जाओं और वन में घुमाकर उन्हें वापस लाना। परिणामस्वरूप प्रभु रात के अंधेरे में नगरवसियों से बचते बचाते वन जाने के लिए निकले। तभी सुमंत उन्हें मदद करने के लिए रथ लेकर आ गए।