डाट्स के तहत मुफ्त इलाज की सुविधा होने के बावजूद जिले में क्षय रोगियों का पूरी तरह इलाज नहीं हो पा रहा है। महज एक साल में इस बीमारी से 35 लोगों की मौत हो गई। विभागीय कर्मचारियों की निगरानी में रोगियों को दवा खिलाने के बावजूद ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिन पर दवाएं काम नहीं करती हैं।
क्षय रोग का इलाज पूरी तरह संभव है। मगर बीच में दवा छोड़ देने पर बीमारी गंभीर हो जाती है। ऐसे मरीजों में एमडीआर (मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट) टीबी विकसित हो जाती है। जिले में 277 एमडीआर मरीज हैं, जिनका मंहगा इलाज करना पड़ रहा है।
ऐसे मरीजों को बिना इलाज के छोड़ा भी नहीं जा सकता क्योंकि इससे दूसरों को बीमारी फैलने की आशंका रहती है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मरीज अज्ञानतावश निजी चिकित्सकों के यहां इलाज कराने पहुंच जाते हैं और पूरे समय तक दवाएं नहीं लेते हैं। ऐसे में बीमारी गंभीर हो जाती है।
इसका परिणाम है कि जिले में टीबी से जूझ रहे 79 मरीज इलाज के अभाव में गंभीर अवस्था में पहुंच चुके हैं। इनमें भी नौ मरीज तो एक्सडीआर श्रेणी में हो चुके हैं, जिन पर कोई दवा काम नहीं कर रही है। ऐसे रोगियों के इलाज पर ढाई से तीन लाख रुपयों का खर्च आता है।