राहुल सांस्कृतिक सृजन पीठ ने सत्यजीत रे की
स्मृति को समर्पित सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन रविवार की रात हिंदी भवन
के सभागार में किया।
इस दौरान देर रात कवियों की प्रस्तुति पर लोग झूमते
रहे। श्रोताओं ने कवियों की रचनाओं पर खूब तालियां बजाईं। मंच पर हिंदी,
उर्दू-भोजपुरी के कुल 25 कवियों का संगम दिलचस्प दृश्य प्रस्तुत कर रहा था।
सभी ने अपनी-अपनी रचनाओं से लोगों को गुदगुदाया। कवियित्री मधु राय ने
खूबसूरत अंदाज में जुर्म तो कुछ ना कुछ इस शोख नजाकत का है, हुश्न की शक्ल
में दिलचस्प कयामत का है। सुनाया तो दर्शकों के बीच एक रवानी छा गई।
इसी
तरह से कार्यक्रम में दयाशंकर तिवारी ने मौजूदा दौर में मानवीय संवेदनाओं
को रेखांकित करते हुए गीत सुनाया वहीं स्नेह सिंह वैष्णवी ने ये दर्द का
सफर है,
पहुंचा हमारे घर है के माध्यम से गीत को ऊंचाई दी तो दर्शकों ने
तालियों के माध्यम से उनका स्वागत एवं हौसला आफजाई की। पुरुषार्थ सिंह ने
गीत के माध्यम से कहा कि नाम बड़े हैं जिनके, उतने बड़े जुआरी।
हम तो निपट
अनाड़ी। सुनाकर समाज में ऊंच नीच के बीच खाई को दर्शाने का प्रयास किया।
डा. जमाली ने गजल के माध्यम से कहा कि सच है ये हमने तरक्की बहुत किया।
मगर
ये भी सच है कि कर्ज में डूबा हुआ है हर बच्चा जो आज पैदा हुआ है। जकी
अहमद ने गजल के माध्यम से कहा कि जमाने में रुसवा हुए जा रहे हैं। खुद अपने
किए की सजा पा रहे हैं।
इम्तेयाज नदीम ने पेशावर के आर्मी स्कूल के बच्चों
के कत्लेआम करने वाले शैतानी चेहरों की खबर अपनी नज्म में प्रस्तुत किया।
नवाज
अंसारी ने कहा कि झूठ के पत्थर हाथ में लेकर लोग घरों से निकलेंगे।
सच्चीबात कभी मत लिखना शीशे की दीवारों पर।
शाद ने अपनी रचना सुनाते हुए
कहा कि जुर्म न एक लब्ज बोले उसको, आदमी होने का अहसास दिलाना होगा। आगे
गिरीश मासूने गजल के माध्यम से कहा कि किसकी किसकी करू वंदगी, जिसको देखो
खुदा हो गया।
मृत्युंजय तिवारी ने समाप्त होती देशी अवधारणाओं पर लंबी
कविता सुनाई। गीतकार राघवेंद्र प्रताप सिंह गीत के माध्यम से मैं अकेला नाव
का मांझी को पढ़ते हुए नाटक असमंजस बाबू के किरदार राकेश यादव से अपने गीत
को जोड़ा।