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साइकिल, मोबाइल बेच कर जुटाया किराया

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कुसुम्हा। लाकडाउन के दौरान रोजी-रोटी बंद हो जाने से प्रवासियों का गांवों को लौटना जारी है। जैसे-तैसे गांव पहुंचे यह कामगार अब बाहर जाने से तौबा कर रहे। इन्हें अपनों तक गांव तक पहुंचने को खासी मशक्कत करनी पड़ी। इस दौरान किसी को साइकिल बेचनी पड़ी तो किसी को अपना मोबाइल बेच कर किराये का जुगाड़ करना पड़ा। दोहरीघाट थाना क्षेत्र के शाहपुर गांव निवासी मनभावती पति बाबूलाल और बच्चों के साथ भिवंडी में रहती थी। दो साल पहले पति का निधन हो जाने के बाद बच्चों को पालने के लिए लूम चलाने लगी। लाक डॉउन के चलते काम बंद हो गया। रोटी के लाले पड़े तो गांव की ओर रुख करना पड़ा। 1200 रुपयों में अपना मोबाइल बेचा फिर भी किराए में 6400 कम पड़ गए तो ट्रक पर मौजूद अन्य यात्रियों ने चंदा कर उसके किराए की भरपाई की। फिर भी ट्रक चालक ने उसे आजमगढ़ में उतार दिया। बच्चों को लेकर पैदल गांव पहुंची। उसके पास न तो जॉब कार्ड है न ही अंत्योदय कार्ड है और ना ही विधवा पेंशन। रोटी के लिए परेशान है। कुछ ऐसी ही कहानी सियरही बरजला के राजू और पवन कनौजिया की है। दोनों मध्यप्रदेश के इंदौर में रहकर कपड़ा धुलाई और प्रेस करने का काम करते थे। लाकडाउन के बाद काम बंद हो गया तो पवन ने अपनी साइकिल और मोबाइल बेच दिया। तीन तीन हजार किराया जुटाकर ट्रक चालक को दिए। चालक ने दोनों को जौनपुर में ही उतार दिया। वहां राजू ने अपना मोबाइल 400 में बेचकर आजमगढ़ तक पहुंचने का जुगाड किया और फिर पैदल गांव पहुंच सके। कुछ ऐसी ही कहानी बबलू की है। वह दिल्ली के उत्तम नगर में रहता था। पास के रुपए खत्म होने पर 3000 किराया देकर ट्रक से आजमगढ़ आया और वहां से अपने घर पहुंचा। यह सभी अपने घरों पर क्वारंटीन हैं। बाहर से आने के चलते इन्हें कोई काम भी नहीं देना चाहता।
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