गुलाम भारत को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों से जमकर लोहा लेने वाले कामरेड जय बहादुर सिंह को जमींदारी और सामंती प्रथा एकदम रास नहीं आई। जमींदार के बेटे होते हुए भी वे सामंतवाद के घोर विरोधी थे। उन्होंने आजादी से पहले ही नहीं बाद में भी सामंतवाद के खिलाफ जोरदार मुुहिम चलाई।
यही नहीं, उन्होंने अपने परिवार द्वारा चलाई जा रही नजराना प्रथा को जन सामान्य के लिए अपमानजनक मानते हुए बंद करा दिया। उनकी इस पहल से जमींदारों और सामंतों में आक्रोश भर गया था। कथनी और करनी में समानता रखने और आजीवन गरीबों की लड़ाई लड़ने वाले जय बहादुर सिंह आजादी के बाद भी जमींदारी और सामंतवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए प्रयासरत रहे।
स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय ः वर्ष 1930 के दशक में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लेने के बाद जय बहादुर सिंह क्रांतिकारी संगठन ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ के नए नेता
मऊ के ही झारखंडेय राय के संपर्क में आए। वर्ष 1936 में प्रतिज्ञा पत्र पर अपने खून से हस्ताक्षर कर क्रांतिकारी गुट के सदस्य बनने वाले जय बहादुर सिंह ने झारखंडेय राय, कृष्णदेव राय, मुक्तिनाथ उपाध्याय, जामिन अली जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियां जारी रखीं।
उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर हथियार खरीदने के लिए धन जुटाने की खातिर खुरहट, पिपरीडीह रेलवे स्टेशनों पर लूटपाट भी की। सरकारी खजाने की लूट की एक योजना के मामले में उन्हेें साढ़े नौ साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। पहले उन्हें गाजीपुर जेल में रखा गया, फिर फतेहगढ़ सेंट्रल जेल भेज दिया गया।
गरीबों, भूमिहीनों, पिछड़ों के लिए संघर्ष ःजेल में वे मशहूर वामपंथी नेता एसजी सरदेसाई के संपर्क में आए और मार्क्सवाद से प्रभावित हो गए। अप्रैल 1946 में जेल से छूटने के बाद जय बहादुर सिंह कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए। इन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश को अपना कार्य क्षेत्र बना लिया।
इसके बाद उन्होंने क्षेत्र में किसानों, मजदूरों को संगठित कर उनके विरुद्घ जारी पक्षपात पूर्ण आचरण के विरुद्ध बिगुल फूंक दिया। उन्होंने अपने ही जमींदार परिवार द्वारा गरीबों से लिया जाने वाला हरी बेगारी नजराना और बेदखली के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। इस प्रथा को बंद कराने से सामंतों और जमींदारों में गुस्सा फैल गया।
यही नहीं, कामरेड जयबहादुर सिंह ने स्वयं अपनी हजारों बीघा भूमि गरीबों, भूमिहीनों, पिछड़ों और दलितों में बांट दी। अपने संघर्षों की बदौलत वे थोड़े ही दिनों में बेहद लोकप्रिय हो गए।