प्रवचन स्थल पर सजी आकर्षक झांकी आकर्षण का केंद्र रही। पंडित मिथिलेश जी
महाराज ने कहा कि त्रेतायुग से मिलती-जुलती लीलाएं आज भी हो रही हैं।
इसे
देखने की दृष्टि हो तो इसका दर्शन किया जा सकता है। आज लोगों का दृष्टिकोण
बदल गया है। कहा कि सनातन धर्म का दृष्टिकोण समझने योग्य है। इतनी गहराई
किसी भी धर्म में नहीं है। इसलिए आज धर्म की आड़ में अधर्म सफल हो जाता है।
कहा कि रावण के पास सारी भौतिक सुख-सुविधाएं थीं। यहां तक कि भगवान
शिव, जानकी भी उपलब्ध थे। इसके बाद भी रावण के जीवन में संतोष और शांति
नहीं थी। कुछ इसी तरह के हालात से आज के दौर में भी लोग गुजर रहे हैं।अगर
बुद्धि विकृत हो जाए तो सही निर्णय नहीं ले सकते।
कहा कि सारी उपलब्धियों
के बाद भी मनुष्य का जीवन अशांत और तनाव से भरा है। आज के दौर में लोगों
का दृष्टिकोण बदल गया है।
इसलिए आत्मचिंतन की जरूरत है। ईश्वर को देखने के
लिए ज्ञान और वैराग्य रुपी दृष्टि को खुला रखना होगा। वे सामने खड़े हैं,
लेकिन हमारा विवेक काम नहीं कर रहा है।
इस कारण परमात्मा के दर्शन से
वंचित हैं। राग को अगर भगवान के चरणों से जोड़ दें तो वह अनुराग बन जाएगा।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दाम्पत्य जीवन परस्पर विश्वास और प्रेम
से चलता है।
लेकिन आज वह बात कहां है। एक पतिव्रता अहिल्या थी,जिसने
श्राप से मुक्त होने पर भी अपने पति को धन्य मानते हुए मानस में कहती हैं
कि यदि उन्हें श्राप नहीं मिला होता तो प्रभु के चरण रज की कृपा कैसे
मिलती। यह अहिल्या के बुद्धि के स्वस्थ होने का सबसे बड़ा प्रमाण है, जो
विकृत हो गया है।