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कोपागंज ब्लाक क्षेत्र के कटंवास कुटी पर रणनीति तैयार करते थे क्रांतिकारी

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इंदारा। गुलामी के दर्द एवं अंग्रेजों के जुल्म से संत कबीर के अध्यात्म एवं जीवन दर्शन को जन-जन तक पहुंचाने वाले संत एवं साध्वी भी पीड़ित हो गए थे। जनपद के इंदारा जंक्शन से तीन किमी पश्चिम कंटवास स्थित कबीरपंथ से जुड़ी कुटी के संतों ने क्रांतिकारियों को शरण प्रदान कर वतन की मिट्टी का कर्ज उतारा था। इसी कुटी से क्रांतिवीर आजादी की लड़ाई की रणनीति तैयार करते थे। इसके बाद हालात ऐसे हुए कि अंग्रेजों ने इस कुटी को सन 1942 में आग के हवाले कर दिया। बात 1942 के पूर्व की है जब कंटवास गांव घने जंगलों एवं बांस के झुरमुटों से घिरा था। 1916 में जौनपुर की बडै़या स्थित आचार्य गद्दी की देखरेख में यहां बस्ती से दूर खाली भूमि पर कबीरपंथियों ने धूनी जगाई। देवी जी के नाम से विख्यात कबीर पंथ की मुख्य साध्वी नागेश्वरी देवी ने यहां कुटिया का निर्माण कर गद्दी संभाली। कुटी एवं आसपास के जर्रे-जर्रे में साधना एवं सामाजिक चेतना जागृत करने वाले संतों ने इसे पवित्रता से सराबोर कर दिया। संत स्वामी प्रकाशानंद, ब्रह्मानंद, अद्वैतानंद, निर्भयदास, साध्वी शांति एवं झकड़ी भगत का आकर्षक व्यक्तित्व लोगों को सहज मंत्रमुग्ध कर देता था। कालचक्र बदला और अंग्रेजों के विरुद्ध जब सरदार भगत सिंह एवं चंद्रशेखर आजाद ने बिगुल बजाया, गांधी ने करो या मरो का नारा दिया तो समूचा भारत जल उठा। इस कुटी के संतों के तार भी आजादी की लड़ाई से जुड़ गए। तत्कालीन आजमगढ़ जनपद के मऊ क्षेत्र में क्रांति का स्वरूप कुछ अलग ही दिखा। रणबांकुरे रात में आते, कुटी पर विश्राम करते और गुप्त बैठक में विध्वंस की योजना बनती थी। यहीं पर काकोरी कांड, पिपरीडीह ट्रेन लूट, सहजनवां, नंदगंज एवं बाराबंकी की घटनाओं का ताना बाना बुना गया था। कुटी पर संतों के लंगर में पंडित अलगू राय शास्त्री, सत्यराम सिंह एवं दलसिंगार दूबे जैसे कांग्रेसी भी भोजन चखे तो कामरेड सरयू पांडेय, झारखंडे राय, जयबहादुर सिंह, रामानंद गुप्त, बद्री नारायण त्रिपाठी एवं धर्मदेव राय ने पुलिस से बचने के लिए शरण लिया करते थे। इंदारा रेलवे स्टेशन तक इन क्रांतिकारियों का सुराग मिलने एवं बाद में गधे के सिर से सींग जैसे गायब होने पर अंग्रेजों के खुफिया जासूस भी चकरा कर रह गये थे।जब अंग्रेजों को इस कुटी की भनक लगी तो रात में रेलगाड़ी स्टेशन से पहले ही खड़ी कर फौज ने कुटी को घेर लिया। खपरैल पर तिरंगा लहराता कुटी देख अंग्रेज जल उठे। संतों ने हम किसी क्रांतिकारी को नहीं जानते से आगे जुबान नहीं खोली। तमतमाये अंग्रेजों ने कुटी को आग के हवाले कर दिया। तत्कालीन कलेक्टर ने तीन हजार के मुआवजे की हामी भरी पर मिले महज पांच सौ रुपये। कुटी की धूल में चंद्रशेखर आजाद के चरण रज शामिल होने की बात भी कही जाती है।आजादी के बाद यहां के स्वामी प्रकाशानंद को सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी घोषित किया। स्वामी जी ने पेंशन एवं अन्य लाभ लेने से साफ मना कर दिया। कुटी से जुड़े कंटवास व आस पास के ग्रामीणों ने कुटी का इतिहास बताते हैं।
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