बड़ागांव शिया समुदाय में गुरुवार की रात मोहर्रम का चांद देखते ही आंखों में आंसू छलक पड़े। इस दौरान समुदाय के लोगों ने इस्तकबले अजा का जुलूस निकाला। साथ ही अंजुमन मसुमिया कदीम के नोहा को पढ़ा गया।
गुरुवार की रात को मोहर्रम का चांद दिखते ही लोगों के आंख में आंसू छलक पड़े। लोगों ने चांद का दीदार करते हुए मोहर्रम का इस्तेकबाल किया। साथ चांद देखते ही अंजुमन सज्जादिया ने सदर इमामबाड़ा, निमतले व अजखाने अबुतालिब में नोहा पड़ा। इसके अलावा इस्तक़बले अजा का जुलूस गुरुवार की रात अंजुमन मसुमिया क़दीम के अजाखाने से निकाला। जो ऩगर के विभिन्न मोहल्लों व कदीमी रास्ते निमतले व बड़ा फाटक से होकर सदर इमामबड़ा पर समाप्त हुआ। जिसमे अंजुमन मसुमिया क़दीम के नोहा खान मोजाहिर ने पढ़ा। वह घर मुझे अच्छा नही लगता जिस घर में रबाब और सकिना नहीं होती..। अलमदार ने पढ़ा, उठो मेरे बेटा अली अकबर खत आया है बीमार बहन का..। जलूस के इफ्तेता में मौलाना बशारत हुसैनी ने कहा हमे कर्बला को समझना चाहिए, कर्बला सिर्फ काले कपड़े पहनने का नाम नहीं है, कर्बला लिबास बदलने का नाम नही है और न ही किरदार बदलने का नाम कर्बला है।
साजिद ने बताया कि मोहर्रम उस याद को लेकर मनाया जाता है जब इमामे हुसैन ने 28 रजब सन 60 हिजरी को यजीदी आतंकवाद को खत्म करने और अपने नाना के दीन को बचाने के लिए अपना वतन छोड़ा था। वह अपने घर वालों को लेकर कर्बला निकल पड़े। साथ में औरतें, भाई, बहन, बच्चे जिसमे 18 दिन का बच्चा अली असगर भी था ।
यजीदी आतंकवादियों ने 10 मोहर्रम को कर्बला में इनको 3 दिन तक भूखा व प्यासा रखकर मार डाला। इसी याद में मोहर्रम मनाया जाता है।