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Mau News: 10 साल में हर चुनाव में नए गठबंधन को सफलता नहीं

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मऊ। वर्ष 2014 के बाद से हर चुनाव में किसी भी राजनीतिक गठबंधन को लोगों ने पंसद नहीं किया। उसे चुनावी कामयाबी नहीं मिली। जिस राजनीति के कारण उसकी जिससे वैचारिक मतभेद थे, उसी के साथ गलबहिया करने में वह असहज महसूस करने लगा था। बात पूर्वांचल के संदर्भ में हो तो यहां दल से जुड़ा हर कार्यकर्ता पार्टी की नीति के साथ दिल से जुड़ा था। यही कारण था कि जब दल का शीर्ष नेता आता था तो अपने मतदाता के अंदर जोश भरने के लिए खुले मंच से दूसरे पक्ष का विरोध करता था। आलम यह था कि पुलिस चौकी, थाना और न्यायालय तक में ऐसे अनेक मामले पहुंचे। लेकिन जिस तरह से पिछले कई सालों में राजनीतिक पेशेवर का दौर आया है, उससे कोर मतदाता की संवेदनशीलता की मौत भी हुई है। दल तो मिल गए लेकिन मतदाता के दिल नहीं मिल सके है। बात जनपद में संदर्भ में हो तो बसपा ने सभी दलों से दूरी बनाते हुए अकेले चुनावी मैदान में उतरी। लेकिन जो धरती कांग्रेस की गढ़ रही उसने सपा के साथ मिलकर बने इंडी गठबंधन के बैनर तले चुनाव लड़ा। जबकि भाजपा ने छोटे से राजनीतिक जीवन वाली सुभासपा जो हर साल नए गठबंधन बनाती है, यह सीट उसे दिया था। ओमप्रकाश राजभर में पूर्व में एनडीए से अलग होने के बाद की गई राजनीतिक बयानबाजी की। इस बार वह भी सुभासपा प्रत्याशी के साथ जुड़ गया। नेता तो पार्टी में होने के नाते जुड़े थे। लेकिन एनडीए के प्रत्याशी और बसपा का कोर वोटर इस नए पेशेवर राजनीति को पहचान गया था। उसने दर पर प्रत्याशी और उसके समर्थक को जमकर आश्वासन की घुट्टी पिलाई। हर दल के लोगों को यही लगा कि यह उसी का मतदाता है। लेकिन वह हो हल्ला और शोर शराबे के बिना शांत होकर वोट दिया। यही कारण है कि इस बार हर दल अपनी स्थिति को भांपने में विफल है। कोई एक तरफा तो कोई कांटे की टक्कर बताता रहा।
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